
नईदुनिया प्रतिनिधि, छिंदवाड़ा। प्रदेश के आदिवासी बहुल क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं और बुनियादी विकास के दावों की जमीनी हकीकत एक बार फिर कटघरे में खड़ी हो गई है। यहां प्रसव पीड़ा से तड़प रही एक गर्भवती महिला को पक्की सड़क और एम्बुलेंस के अभाव में करीब तीन किलोमीटर तक लकड़ी की डोली (खाट/झोली) में लादकर मुख्य मार्ग तक पहुँचाना पड़ा।
खास बात यह है कि जिले में पिछले महज तीन दिनों के भीतर इस तरह की यह दूसरी घटना सामने आई है, जो ग्रामीण अंचलों में स्वास्थ्य और सड़क बुनियादी ढांचे के दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। प्रशासनिक दावों के विपरीत, आज भी कई दूरदराज के इलाके आधुनिक विकास की रोशनी से कोसों दूर हैं।
सामने आए वायरल वीडियो के अनुसार, यह घटना देर रात करीब 2:00 बजे की है। बारिश और अंधेरे के बीच परिजन अपनी बेटी/पत्नी की जान बचाने के लिए उबड़-खाबड़ और पथरीले रास्तों पर डोली उठाकर चलने को मजबूर थे। रात के वक्त उपजी इस आपातकालीन स्थिति ने ग्रामीणों की बेबसी को और अधिक बढ़ा दिया।
परिजनों द्वारा भारी मशक्कत और जोखिम उठाते हुए गर्भवती महिला को मंगलवार बुधवार की दरमियानी रात तीन बजे सीएचसी दमुआ लाया गया ।मौके पर मौजूद स्टॉफ ने सक्रियता दिखाते हुए उसे महज 10 मिनट में बेहद जरूरी उपचार देकर जिला अस्पताल के लिए रिफर कर दिया।
मिली जानकारी के मुताबिक प्रसव के लिए पहुंची महिला का नाम कूकरपानी निवासी 23 वर्षीय झमनिया पति रामविलास है। परिजनों ने डोली में रखकर मुख्य मार्ग तक लाया। जहां पहले से या संपर्क करने के बाद पहुंची एम्बुलेंस की मदद से उसे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र दमुआ पहुंचाया गया।
गनीमत यह रही कि समय रहते महिला को अस्पताल पहुंचा दिया गया, जिससे प्रसूता और उनके परिजनों को राहत मिल सकी। ग्रामीणों का कहना है कि क्षेत्र में सड़क मार्ग न होने के कारण हर बार बरसात या आपातकाल में मरीजों को इसी तरह जान जोखिम में डालकर ले जाना उनकी मजबूरी बन चुका है। इस घटना के बाद स्थानीय नागरिकों में स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन के प्रति भारी आक्रोश देखा जा रहा है।
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