
सुनील गौतम, दमोह। प्रदेश में नई विधानसभा के गठन के लिये 17 नवंबर को मतदान हो चुका है, अब सबकी निगाहें तीन दिसंबर को होने वाली मतगणना पर आकर टिक गई है। इस बार जिले में चारों विधानसभा क्षेत्र में 57 उम्मीदवार मैदान में उतरे है। ऐसे में अलग-अलग विधानसभा में मत पाने वाले चार उम्मीदवार ही विधानसभा में पहुंचेंगे, फिर भी हर बार चुनाव के दौरान अपनी किस्मत आजमाने वालों की कमी नहीं रहती।
दमोह जिले के इतिहास पर नजर डाली जाए तो 1952 से लेकर 2018 तक के तक विधानसभा चुनाव एवं 2021 के दमोह विधानसभा के उपचुनाव में 636 प्रत्याशियों में से 502 प्रत्याशी अपनी जमानत जब्त करा चुके है। अगर इनका औसत निकाला जाए तो जमानत जप्त कराने वालों की संख्या 75 फीसदी होती है यानी कि महज 25 फीसदी उम्मीदवार ही अपनी जमानत बचाने में कामयाब होते है। इस बार के चुनाव में भी भाजपा कांग्रेस के अलावा कई सियासी दलों ने अपने उम्मीदवार चुनाव मैदान में उतारे है। बहुत से निर्दलीय उम्मीदवार भी अपनी किस्मत आजमा रहे है। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि जिले की चारों विधानसभा में इस बार उम्मीदवारों की भीड़ सी लग गई है।
विधानसभा का चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवार को निर्वाचन आयोग के निर्देशानुसार निर्वाचन अधिकारी के पास नामांकन दाखिल करते समय जमानत के रुप में एक निश्चित राशि जमा करनी पड़ती है। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 34/1 ख के अनुसार विधानसभा चुनाव लड़ने वाले सामान्य उम्मीदवार को वर्तमान में जमानत के तौर पर 10 हजार रुपए की राशि तो अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए पांच हजार रुपए की राशि जमा करना पड़ती है।
विधानसभा चुनाव लड़ने वाला कोई उम्मीदवार अगर विधानसभा क्षेत्र के कुल मतदाताओं की संख्या के 16 फीसदी मत भी प्राप्त नहीं कर पाता है। तो निर्वाचन आयोग में जमा की गई उसकी राशि को निर्वाचन आयोग जप्त कर लेता है, इसे सामान्य भाषा में प्रत्याशी की जमानत जब्त होना कहा जाता है। उदाहरण के रूप में अगर किसी विधानसभा क्षेत्र में एक लाख मतदाता है तो उस विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों को 16 हजार से भी ज्यादा मत हासिल करने होंगे। अगर वह इतने मत हासिल नहीं कर सकता तो उसकी जमानत जप्त हो जाएगी और यदि वह इससे अधिक मत हासिल कर लेता है तो वह अपनी जमानत बचा लेता है और उसके द्वारा जमा की गई राशि उसे वापिस मिल जायेगी।