
World Milk Day 2024: कुलदीप सक्सेना, दतिया। दूध की लगातार बढ़ रही उपयोगिता के कारण इसके उत्पादन में भी बढ़ोत्तरी हुई है। दतिया में पिछले वर्ष जहां जिले में दूध का कुल उत्पादन 338 मैट्रिक टन था जो इस वर्ष बढ़कर 440 मैट्रिक टन हो गया। दूध-डेयरी के क्षेत्र का यहां तेजी से विस्तार हो रहा है। जिसके कारण पूरे संभाग में दतिया जिला दुग्ध उत्पादन के क्षेत्र में चौथे स्थान पर है।
दतिया जिले के पशुपालक भी अच्छी नस्लों के दुधारु पशुओं को पालने को लेकर ज्यादा इच्छुक रहते हैं ताकि उन्हें अच्छी मात्रा में उनसे दूध का उत्पादन मिल सके। ज्यादातर मुर्रा नस्ल की भैंस और गिर नस्ल की गायों की जिले में अच्छी संख्या है। बढ़ते दुग्ध उत्पादन को देखते हुए गुजरात की अमूल जैसी संस्था ने भी दतिया के गोराघाट में अपना कलेक्शन सेंटर खोल दिया है।
वहीं सिंकदरा, घूघसी, गोविंदपुर आदि गांवों में भी दूध का कलेक्शन किया जा रहा है। यही दूध टेंकरों से भरकर बड़ी फैक्टरियों में हर रोज पहुंच रहा है। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन ने 2001 से हर वर्ष एक जून को विश्व दुग्ध दिवस मनाने की शुरुआत की थी। ताकि दुनिया भर में लोग दूध और दूध निर्मित चीजों की उपयोगिता को समझें।

वर्तमान में दतिया जिले में लगभग सात से आठ लाख लीटर प्रतिदिन दूध का उत्पादन हो रहा है। जिसके कारण जिले से पड़ोसी क्षेत्रों में काफी मात्रा में दूध टेंकरों से भेजा जाता है। दूध का कारोबार भी धीरे-धीरे उद्योग का रूप लेता जा रहा है। दूध बनने वाले उत्पादनों के लिए भी दतिया से दूध बाहर बड़ी कंपनियों में पहुंचता है। जिनमें नोवा, सांची और पारस आदि जैसी कंपनियां दूध खरीदती है।
मालनपुर सहित झांसी सहित अन्य चिलिंग सेंटर पर दूध भेजा जाता है। दूध की लगातार बढ़ रही खपत के कारण ही यहां पशुपालन को लेकर कृषकों का रुझान बढ़ा है। कुछ जगह देशी गायों का भी पालन हो रहा है। दतिया, भांडेर, सेवढ़ा एवं इंदरगढ़ क्षेत्र के गांवों में डेयरी उद्योग काफी संख्या में हैं। दतिया में कुरथरा, लरायटा, अगोरा सहित आसपास के चार दर्जन गांवों से हर रोज काफी मात्रा में दूध दतिया पहुंचता है।
दुग्ध उत्पादन बढ़ाने की दिशा में पशुपालक नई तकनीकी और अच्छी नस्ल को प्राथमिकता देते हैं। वर्तमान में पूरे जिले की बात करें तो यहां एक लाख 29 हजार दुधारु पशु हैं। जिनमें एक लाख 14 हजार मुर्रा व अन्य नस्ल की भैंसें और 15 हजार दुधारु गौवंश शामिल हैं। दुध उत्पादन की बढ़ोतरी में निरंतरता के लिए अच्छी नस्लों के पशुओं की आवश्यकता होती है। बाहरी क्षेत्रों से संपन्न पशुपालक तो पशु ले आते हैं। लेकिन मध्यम पशुपालकों के लिए इसे लेकर चिंता रहती है।
लेकिन अब वर्तमान में कृत्रिम गर्भाधान से यह समस्या काफी हद तक हल हुई है। पशुपालन विभाग के उपसंचालक डा. दास बताते हैं कि इस तकनीक में सैक्स शार्टेड सीमन से 90 प्रतिशत चांस रहता है कि फीमेल पैदा हो। इस मदद से पशुपालकों को मदद मिली है। पहले इसकी दर 450 रुपये प्रति पशु आती थी जिसे शासन ने वर्तमान में घटाकर सिर्फ 100 रुपये कर दिया है। ताकि ज्यादातर पशुपालक इसका लाभ ले सकें। अच्छी नस्ल से मिल्क प्रोडक्शन भी बढ़ेगा।
दुग्ध उत्पादन की स्थिति में दतिया जिले पूरे संभाग में चौथे पायदान पर है। जिसका कारण यहां लगातार डेयरी संचालन को मिल रहा प्रोत्साहन है। साथ ही पड़ोसी जिलों में भी बड़े प्लांटों पर दूध खपत अधिक होने के कारण, वहां दतिया जिले से भी दूध की आपूर्ति बढ़ी है। 440 मैट्रिक टन वर्ष भर का उत्पादन होने से जिला अच्छे दूध उत्पादक की श्रेणी में गिना जाता है।
इसके साथ ही पूरे प्रदेश में पशुपालन केसीसी के मामले में भी दतिया जिले अग्रणी रहा है। जिले को पशु केसीसी का 1650 लक्ष्य मिला था। जिसमें 1877 फार्म जमा हुए थे। जिसमें से 1477 स्वीकृत हो गए हैं। वहीं पशुओं के टीकाकरण में भी संभाग भर में दतिया अच्छी स्थिति में है।