
सत्येंद्रसिंह राठौर. नईदुनिया, देवास। बिहार में जनसंख्या की अधिकता, रोजगार की कमी, आर्थिक संकट से जूझ रहे परिवार की देखभाल के लिए अररिया, सुपौल सहित कई अन्य जिलों के नव युवक रुपये कमाने देवास जिले के टोंककला में पटाखा फैक्टरी में काम करने आए। किसी को बहन की शादी के दौरान लिया गया कर्ज चुकाने में परिवार की मदद करना था तो किसी के पास छोटे भाई-बहनों की जिम्मेदारी थी।
अधिक रुपये मिले इसलिए कई श्रमिक पटाखा फैक्टरी में ओवरटाइम करते थे। 24 घंटे में 15-16 घंटे तक काम करके ये 25 हजार रुपये प्रतिमाह तक कमा लेते थे। इनका सपना था कि साल-दो साल में काफी राशि एकत्रित कर लेंगे जिससे परिवार का आर्थिक संकट दूर होगा, कर्ज चुका देंगे और परिवार आर्थिक संकट से उबरकर पटरी पर आ जाएगा लेकिन फैक्टरी में धमाके से ये सारे सपने टूट गए और तो और कई श्रमिकों का दो से तीन माह का वेतन भी नहीं मिला और इनको घरों की ओर लौटना पड़ा। हादसे के बाद बिहार सहित टोंककला के आसपास के कई गांवों के सैकड़ों युवा, महिलाएं बेरोजगार हुए हैं।
पटाखा फैक्टरी में काम करने वाले श्रमिक बिहार के सुपौल जिले के गढ़िया गोविंदपुर निवासी संतोष कुमार ने बताया उनके रिश्तेदार ललटू कुमार पहले से टोंककला फैक्टरी में काम कर रहे थे, उनके माध्यम से यहां के बारे में पता चला। बड़ी बहन की शादी हुई थी, उसमें परिवार पर कर्ज हो गया था, उसे चुकाना था इसलिए करीब चार महीने पहले पटाखा फैक्टरी आया। आठ घंटे काम के बदले 15 हजार रुपये वेतन तय हुआ। 14 मई की सुबह नाश्ता किया था, साथ वालों ने बोला ठंडा पानी भरकर ले आओ, पानी भरने के बाद जैसे ही रवाना हुआ अचानक धमाका हो गया, दीवार के टुकड़े बिखरने से हाथ में चोट लगी, मैं बाल-बाल बच गया। मेरे परिवार में कमाने वाला कोई नहीं है, पिता रामचंदर मजदूरी करते हैं। मुझसे छोटा एक भाई व एक बहन है।
बिहार के अररिया जिले के गोखलापुर निवासी नासिर ने बताया गांव में सिलाई का काम करता था। इससे 8-10 हजार रुपये प्रतिमाह मिलते थे, इससे परिवार की आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं हो पाती थी। इसी दौरान पता चला कि देवास जिले में पटाखा फैक्टरी में काम मिल रहा है। गांव के ही आजास खान के माध्यम से यहां करीब चार माह पहले आया। यहां 18 हजार रुपये प्रतिमाह वेतन में काम शुरू किया। पिता की आंखों की समस्या के कारण उन्हें स्पष्ट नजर नहीं आता। परिवार में छोटी बहन है, पूरे परिवार की जिम्मेदारी मेरे ऊपर है। 14 मई को जब धमाका हुआ तो मेरा 23 हजार रुपये का माेबाइल फोन क्षतिग्रस्त हो गया। वेयर हाउस में जहां सैकड़ों श्रमिकों के रहने के इंतजाम किए थे, कपड़े वहीं रह गए। तीन माह के करीब 54 हजार रुपये नहीं मिले हैं, अब गांव खाली हाथ जाना पड़ रहा है, पता नहीं आगे क्या करूंगा।
ग्राम कतइया जिला सुपौल बिहार के निवासी शशि पासवान करीब तीन माह पहले पटाखा फैक्टरी में आए थे। वेतन 15 हजार रुपये प्रतिमाह था, ओवरटाइम भी करते थे, जिससे 25 हजार रुपये तक का हिसाब हो जाता था। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। पिता दूसरे के खेतों में मजदूरी करते हैं, उसे घर का खर्च नहीं चल पाता था। एक छोटी बहन व चार भाइयों की जिम्मेदारी भी मुझ पर है। पटाखा फैक्टरी में हादसे के बाद कुछ काम-धंधा नहीं बचा है। सुपौल जिले में कोई बड़े उद्योग भी नहीं हैं, ऐसे में लोगों को कमाई के लिए बाहर जाना पड़ता है।
जिला अस्पताल से जिन मरीजों को डिस्चार्ज करके उनके गांव रवाना किया गया है, उनके सभी के नाम-पते, मोबाइल नंबर आदि नोट किए गए हैं। कई श्रमिकों ने बकाया वेतन के बारे में बताया था। मामले की जांच के बाद आगे जैसी स्थिति बनेगी, उनको सूचित किया जाएगा। -कपिल गुर्जर, नायब तहसीलदार देवास