
चंद्रप्रकाश शर्मा, नईदुनिया, देवास : शारदीय नवरात्र में माता टेकरी मां तुलजा भवानी और चामुंडा माता की आराधना में डूबेगी। श्रद्धालु देवी के दरबार में शीश नवाएंगे, आस्था के दीप जलेंगे और पहाड़ी पर भक्ति का उजास बिखरेगा।
इसी टेकरी से जुड़ी एक कहानी ऐसी भी है, जो करीब 114 साल पहले एक अंग्रेज लेखक को देवास खींच लाई थी। वह थे- ईएम फार्स्टर, जो आगे चलकर विश्वप्रसिद्ध उपन्यासकार बने। वह यहां किसी राजमहल की भव्यता देखने नहीं, बल्कि संस्कृत के महाकवि कालिदास से जुड़ी प्राचीन स्मृतियों की तलाश में आए थे। समय के साथ देवास की यही पहाड़ी उनकी चर्चित पुस्तक द हिल आफ देवी के नाम में दर्ज हो गई और साहित्य के पन्नों पर अमर हो गई।
फार्स्टर अक्टूबर 1912 में भारत यात्रा के दौरान देवास आए थे। संस्कृत साहित्य और कालिदास की रचना अभिज्ञान शाकुंतलम् से प्रभावित फार्स्टर को उम्मीद थी कि देवास और उज्जैन की यात्रा में उन्हें महाकवि से जुड़ा कोई भौतिक साक्ष्य मिल सकेगा।
उन्होंने उज्जैन और देवास के अनुभवों को अपने यात्रा लेखन में भी दर्ज किया। हालांकि, प्राचीन स्थलों की तलाश में उन्हें निराशा हुई। पुराने भवनों और खंडहरों को लेकर उनकी टिप्पणी थी कि पुरानी इमारतें इमारतें होती हैं और खंडहर खंडहर। उनकी यह यात्रा केवल दर्शनीय स्थलों तक सीमित नहीं थी, बल्कि भारत के इतिहास, साहित्य और सांस्कृतिक स्मृतियों को समझने की कोशिश भी थी।
वर्ष 1921 में फार्स्टर फिर देवास आए। इस बार वह पर्यटक नहीं, बल्कि देवास सीनियर रियासत के महाराजा तुकोजीराव तृतीय के निजी सचिव थे। अपने मित्र सैयद रास मसूद के निमंत्रण पर भारत आए फार्स्टर का परिचय महाराजा से सर मैल्कम डार्लिंग ने कराया था। वह करीब छह महीने देवास में रहे। इस दौरान उन्होंने रियासत के राजपरिवार, शासन व्यवस्था और सामाजिक जीवन को करीब से देखा। मीठा तालाब के सामने स्थित सागर महल में उन्होंने समय बिताया। यह इमारत अब अस्तित्व में नहीं है, लेकिन फार्स्टर के लेखन में उसकी स्मृतियां बची हुई हैं।
फार्स्टर के देवास प्रवास, पत्रों और अनुभवों से जुड़ी पुस्तक द हिल आफ देवी वर्ष 1953 में लंदन से प्रकाशित हुई। इसके शीर्षक में देवास की उस पवित्र पहाड़ी की छवि है, जहां देवी मंदिर और चामुंडा की गुफा स्थित है। पुस्तक में तत्कालीन रियासत के जीवन और भारतीय राजपरिवारों की दुनिया की झलक मिलती है। देवास की खासियत यह भी रही कि यहां देवास सीनियर और देवास जूनियर नाम की दो रियासतें थीं। दोनों के प्रशासन और व्यवस्थाओं की अलग पहचान थी। फार्स्टर ने इस अनूठे अनुभव को भी अपने लेखन में स्थान दिया।
यह भी पढ़ें- Dewas Mata Mandir: नवरात्र में देवास की माता टेकरी पर बरसा धन, थाइलैंड का 'नोट' भी निकला