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नवरात्र विशेष : कालिदास की तलाश में देवास आया विश्वविख्यात उपन्यासकार, देवी की पहाड़ी पर लिख गया किताब

शारदीय नवरात्र में माता टेकरी मां तुलजा भवानी और चामुंडा माता की आराधना में डूबेगी। श्रद्धालु देवी के दरबार में शीश नवाएंगे, आस्था के दीप जलेंगे और पह...और पढ़ें

By Chandra Prakasha SharmaEdited By: Ramnath Mutkule
Publish Date: Sun, 11 Oct 2026 08:37:02 AM (IST)Updated Date: Sun, 11 Oct 2026 08:37:02 AM (IST)
नवरात्र विशेष : कालिदास की तलाश में देवास आया विश्वविख्यात उपन्यासकार, देवी की पहाड़ी पर लिख गया किताब
देवास की माता टेकरी। -फाइल फोटो

HighLights

  1. उपन्यासकार ईएम फार्स्टर 1912 में संस्कृत कवि की स्मृतियां तलाशने पहुंचे थे देवास
  2. नौ साल बाद महाराजा के निजी सचिव बनकर लौटे, सागर महल में बिताया समय
  3. रियासत के अनुभवों से जन्मी ‘द हिल आफ देवी’

चंद्रप्रकाश शर्मा, नईदुनिया, देवास : शारदीय नवरात्र में माता टेकरी मां तुलजा भवानी और चामुंडा माता की आराधना में डूबेगी। श्रद्धालु देवी के दरबार में शीश नवाएंगे, आस्था के दीप जलेंगे और पहाड़ी पर भक्ति का उजास बिखरेगा।

इसी टेकरी से जुड़ी एक कहानी ऐसी भी है, जो करीब 114 साल पहले एक अंग्रेज लेखक को देवास खींच लाई थी। वह थे- ईएम फार्स्टर, जो आगे चलकर विश्वप्रसिद्ध उपन्यासकार बने। वह यहां किसी राजमहल की भव्यता देखने नहीं, बल्कि संस्कृत के महाकवि कालिदास से जुड़ी प्राचीन स्मृतियों की तलाश में आए थे। समय के साथ देवास की यही पहाड़ी उनकी चर्चित पुस्तक द हिल आफ देवी के नाम में दर्ज हो गई और साहित्य के पन्नों पर अमर हो गई।

फार्स्टर अक्टूबर 1912 में भारत यात्रा के दौरान देवास आए थे। संस्कृत साहित्य और कालिदास की रचना अभिज्ञान शाकुंतलम् से प्रभावित फार्स्टर को उम्मीद थी कि देवास और उज्जैन की यात्रा में उन्हें महाकवि से जुड़ा कोई भौतिक साक्ष्य मिल सकेगा।


उज्जैन और देवास के अनुभवों को अपने यात्रा लेखन में भी दर्ज किया

उन्होंने उज्जैन और देवास के अनुभवों को अपने यात्रा लेखन में भी दर्ज किया। हालांकि, प्राचीन स्थलों की तलाश में उन्हें निराशा हुई। पुराने भवनों और खंडहरों को लेकर उनकी टिप्पणी थी कि पुरानी इमारतें इमारतें होती हैं और खंडहर खंडहर। उनकी यह यात्रा केवल दर्शनीय स्थलों तक सीमित नहीं थी, बल्कि भारत के इतिहास, साहित्य और सांस्कृतिक स्मृतियों को समझने की कोशिश भी थी।

नौ साल बाद लौटे, इस बार राजदरबार से जुड़ा नाता

वर्ष 1921 में फार्स्टर फिर देवास आए। इस बार वह पर्यटक नहीं, बल्कि देवास सीनियर रियासत के महाराजा तुकोजीराव तृतीय के निजी सचिव थे। अपने मित्र सैयद रास मसूद के निमंत्रण पर भारत आए फार्स्टर का परिचय महाराजा से सर मैल्कम डार्लिंग ने कराया था। वह करीब छह महीने देवास में रहे। इस दौरान उन्होंने रियासत के राजपरिवार, शासन व्यवस्था और सामाजिक जीवन को करीब से देखा। मीठा तालाब के सामने स्थित सागर महल में उन्होंने समय बिताया। यह इमारत अब अस्तित्व में नहीं है, लेकिन फार्स्टर के लेखन में उसकी स्मृतियां बची हुई हैं।

टेकरी के नाम पर दुनिया तक पहुंची देवास की कहानी

फार्स्टर के देवास प्रवास, पत्रों और अनुभवों से जुड़ी पुस्तक द हिल आफ देवी वर्ष 1953 में लंदन से प्रकाशित हुई। इसके शीर्षक में देवास की उस पवित्र पहाड़ी की छवि है, जहां देवी मंदिर और चामुंडा की गुफा स्थित है। पुस्तक में तत्कालीन रियासत के जीवन और भारतीय राजपरिवारों की दुनिया की झलक मिलती है। देवास की खासियत यह भी रही कि यहां देवास सीनियर और देवास जूनियर नाम की दो रियासतें थीं। दोनों के प्रशासन और व्यवस्थाओं की अलग पहचान थी। फार्स्टर ने इस अनूठे अनुभव को भी अपने लेखन में स्थान दिया।

एक पहाड़ी, आस्था से साहित्य तक का सफर

  • फार्स्टर का प्रसिद्ध उपन्यास ए पैसेज टू इंडिया भी भारत में उनके अनुभवों से जुड़ा है। वह इसके अधूरे अध्याय लेकर देवास आए थे, लेकिन उपन्यास 1924 में इंग्लैंड लौटने के बाद पूरा हुआ।
  • आज नवरात्र में माता टेकरी पर उमड़ने वाली श्रद्धा के बीच फार्स्टर की कहानी देवास की एक और पहचान सामने लाती है।
  • जिस पहाड़ी पर भक्त देवी के दर्शन करने आते हैं, उसी ने एक विदेशी लेखक को इतना प्रभावित किया कि उसका नाम उनकी पुस्तक का शीर्षक बन गया।
  • देवास की यह विरासत बताती है कि कुछ स्थान केवल आस्था के केंद्र नहीं होते, वे इतिहास और साहित्य की स्मृतियों को भी अपने भीतर सहेजते हैं।

  • 1912 : ईएम फार्स्टर की पहली देवास यात्रा, कालिदास से जुड़ी स्मृतियों की तलाश।
  • 1921 : महाराजा तुकोजीराव तृतीय के निजी सचिव के रूप में देवास वापसी।
  • 1924 : ए पैसेज टू इंडिया का प्रकाशन।
  • 1953 : द हिल आफ देवी का प्रकाशन, जिसमें देवास की टेकरी और रियासती जीवन की झलक मिलती है।

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