
शैलेंद्र लड्डा, नईदुनिया, निसरपुर : सरदार सरोवर बांध की डूब से प्रदेश की सबसे बड़ी बसाहट निसरपुर को उजड़े हुए एक दशक बीत चुका है, लेकिन विस्थापन का दर्द आज भी सैकड़ों परिवारों का पीछा नहीं छोड़ रहा है। कभी जिन घरों में परिवारों की खुशियां बसती थीं, आज वहां नर्मदा का बैकवाटर पसरा है।
कई परिवारों के घर पिछले 10 वर्षों में सात बार डूब चुके हैं। घरों का नामोनिशान मिट गया, लेकिन उनके हक की पांच लाख 80 हजार की पुनर्वास पैकेज राशि आज तक नहीं मिली। विडंबना यह है कि छह बार सर्वे होने के बाद भी 525 परिवारों के मामले सरकारी फाइलों में लंबित हैं। कोई टिन शेड में तो कोई बैकवाटर के किनारे जीवन गुजारने को मजबूर हैं।
निसरपुर में डूब से बाहर मानी गई चार बस्तियों के 525 परिवारों को शासन ने पुनर्वास स्थल पर भूखंड तो आवंटित कर दिए, लेकिन प्रत्येक परिवार को मिलने वाली पांच लाख 80 हजार की पुनर्वास पैकेज राशि अब तक नहीं मिली है।
डूब के गांव में 127 मीटर के जलस्तर से पानी भरना शुरू होता है और 138.68 मीटर पर पूरा गांव डूब में आ जाता है। चार बस्तियों के इन परिवारों को जलस्तर के मामूली अंतर के आधार पर डूब से बाहर मान लिया गया, जबकि इनके घर बैकवाटर की चपेट में आते रहे।
बीते 10 वर्षों में कई परिवारों के घर सात बार डूब चुके हैं। कभी घर-आंगन और सामान बचाने की चिंता तो कभी परिवार को सुरक्षित स्थान पर ले जाने की मजबूरी रही। आज उन घरों का अस्तित्व तक नहीं बचा है।
निसरपुर पुनर्वास स्थल के डूब चुके घरों से प्रभावित लगभग 60 परिवार आज भी टिन शेड में रहने को मजबूर हैं। शेष परिवार बैकवाटर के समीप अपना जीवन गुजार रहे हैं।
सरकारी स्तर पर इन परिवारों की स्थिति जानने के लिए पिछले 10 वर्षों में छह बार सर्वे किया जा चुका है। हर बार उम्मीद जगी कि अब उनके मामलों का निराकरण होगा, लेकिन आज तक राहत राशि नहीं मिल सकी।
शासन ने परिवारों को पुनर्वास स्थल पर भूखंड देकर अपनी जिम्मेदारी का एक हिस्सा तो पूरा किया, लेकिन 5.80 लाख की राशि नहीं मिलने से इन परिवारों का आर्थिक पुनर्वास अधूरा है।
सवाल यह है कि जिन परिवारों के घर सात बार डूब चुके हैं, जिनकी बस्तियों का अस्तित्व मिट चुका है और जिनकी परेशानी के लिए छह बार सर्वे हो चुका है, उन्हें आखिर अपने हक की राशि के लिए और कितने वर्षों तक इंतजार करना पड़ेगा।
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