
शैलेंद्र लड्डा, नईदुनिया, सुसारी (धार) : नर्मदा किनारे कोटेश्वर तीर्थ के अहिल्या घाट पर प्राचीन कोटेश्वर महादेव मंदिर सरदार सरोवर बांध के बैकवाटर में डूब गया था। साल 2006 में इस पुरातात्विक और ऐतिहासिक धरोहर को तीर्थ से हटाकर कुक्षी-बड़वानी मार्ग से 500 मीटर की दूरी पर सोडल बाबा पहाड़ी के समीप गुमनाम स्थान पर विस्थापित कर दिया गया, लेकिन न तो वहां तक जाने के लिए सड़क है, न भक्तों को पता है कि यह प्राचीन धार्मिक धरोहर यहां है।
निसरपुर से महज पांच किमी की दूरी पर नर्मदा किनारे प्राचीन तीर्थ कोटेश्वर तीर्थ पर कुबेर के पुत्र ने तपस्या कर यहां तीर्थ के सबसे नीचे के घाट पर कोटेश्वर महादेव की स्थापना की थी। तीर्थ के प्राचीन महत्व को लेकर नर्मदा पुराण और अन्य धार्मिक ग्रंथों में इसका उल्लेख किया गया है।
सरदार सरोवर बांध के बैकवाटर में प्रदेश में सबसे पहले इस मंदिर को विस्थापित करने का कार्य साल 2006 में शुरू हुआ और 2008 में पूर्ण हुआ। घाट से मंदिर के एक-एक हिस्से को अलग-अलग निकालकर क्रमवार इसे सोडल बाबा पहाड़ी पर विस्थापन के बाद मंदिर अपने मूल स्वरूप में तो खड़ा है, लेकिन उसका धार्मिक वैभव और सामाजिक जुड़ाव पूरी तरह छिन्न-भिन्न हो चुका है।
आज स्थिति यह है कि मंदिर तक न तो पहुंचने का रास्ता है। एक कच्चा मार्ग है, जो कीचड़ और झाड़ियों से घिरा हुआ है। मंदिर में मूलभूत सुविधाएं तक मौजूद नहीं हैं। परिसर के नाम पर एक चाहरदीवारी बनी हुई है, जिसमें गंदगी नजर आती है। वहीं इसके बाहर हिस्से में अतिक्रमण किया हुआ है।
कोटेश्वर तीर्थ की इस प्राचीन धरोहर को जब इस वीरान स्थान पर विस्थापन की प्रक्रिया की जा रही थी, तब इसका लोगों ने विरोध किया। इसे लेकर भक्त रणछोड़ मामा, निसरपुर बताते हैं कि हमने मंदिर को तीर्थ के समीप ही विस्थापन की बात रखी। इतनी दूर विस्थापन का विरोध भी किया।
साल 2006 में तो मुझ पर सरकारी कार्य में बाधा को लेकर कार्रवाई में मुझे दो दिन की जेल भी हुई। इसके बाद छह साल तक कोर्ट में मामला चला, फिर जाकर बरी हुआ। पर आज जब मंदिर की दुर्दशा देखता हूं तो मन भारी हो जाता है।
आज से दो दशक पहले विस्थापित हुआ यह मंदिर भले ही स्थापत्य रूप से सुरक्षित है, लेकिन इसके आसपास के हालात देखकर यह कहना गलत नहीं होगा कि श्रद्धा और व्यवस्था दोनों ही विस्थापित हो चुकी हैं। पुरातत्व विभाग का कहना है कि यह हमारे अधीन नहीं है।
हमने तो नर्मदा घाटी विकास विभाग के निर्देश पर विस्थापित किया और नर्मदा घाटी विभाग का कहना है कि डूब के बैक वाटर में आने के कारण विस्थापन किया है। ऐसे में दुर्भाग्यपूर्ण है कि हजारों साल पुरानी आस्था की मूर्त यह छाया आज वीरानी की गिरफ्त में है।
प्राचीन धरोहर तक आने-जाने के लिए अतिक्रमण हटाकर पक्के मार्ग का निर्माण किया जाए। साथ ही कुक्षी-बड़वानी मुख्य मार्ग पर एक सूचना बोर्ड लगाया जाए कि यह प्राचीन मंदिर यहां पर विस्थापित है, ताकि नर्मदा परिक्रमा वासियों के साथ स्थानीय भक्त मंदिर तक पहुंच सके, पर दो दशक बीत जाने के बाद भी आज तक इस व्यवस्था को लेकर ना तो प्रशासन ने ध्यान दिया है, न ही जनता के चुने हुए जनप्रतिनिधियों ने इस ओर खबर ली है।
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