विश्व पर्यटन दिवस : दुर्लभ हिंदू-जैन स्थापत्य हो रहा नष्ट, सो रहा तंत्र… उपेक्षा में दम तोड़ रही मांडू की विरासत
मांडू से करीब चार किलोमीटर दूर सोडपुर के जंगल में इतिहास का एक ऐसा अध्याय दफन है, जो आज अपने अस्तित्व के लिए संरक्षण मांग रहा है। विंध्य की करीब 633 म...और पढ़ें
Publish Date: Sat, 26 Sep 2026 07:59:37 PM (IST)Updated Date: Sat, 26 Sep 2026 08:30:36 PM (IST)
संरक्षण के अभाव में बूढ़ी मांडू में अमूल्य पूरा धरोहरे नष्ट होने की कगार पर पहुंच चुकी हैं। - नईदुनियाHighLights
- 10वीं सदी की समृद्ध नगरी के अवशेष जंगल में उपेक्षित
- 250 से अधिक प्रतिमाओं में से 204 धार किले में
- बाकी संरक्षण के अभाव में बर्बादी की ओर
कपिल पारिख, नईदुनिया, मांडू (धार)। मांडू से करीब चार किलोमीटर दूर सोडपुर के जंगल में इतिहास का एक ऐसा अध्याय दफन है, जो आज अपने अस्तित्व के लिए संरक्षण मांग रहा है। विंध्य की करीब 633 मीटर ऊंची पहाड़ियों के बीच बसी बूढ़ी मांडू कभी मांडवगढ़ और तरंगगढ़ के नाम से जानी जाती थी। परमार, राष्ट्रकूट और प्रतिहार काल की इस प्राचीन नगरी में हिंदू और जैन स्थापत्य के दुर्लभ अवशेष मौजूद हैं। विडंबना यह है कि जिस विरासत को इतिहास की अमूल्य धरोहर माना जाना चाहिए, वह आज संरक्षण के अभाव में धीरे-धीरे नष्ट हो रही है।
सदियों पुरानी नगरी, आज वीरान
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बूढ़ी मांडू के अवशेष इसकी प्राचीन समृद्धि की कहानी कहते हैं। 1980 में सफाई और पुरातात्विक कार्य के दौरान यहां तीन शिव मंदिरों के अवशेष, किले का परकोटा, प्राचीन घाट, तालाब, शाही परिसर और बड़ी संख्या में देव प्रतिमाएं मिली थीं। इनमें शिव, गणेश और विष्णु की प्रतिमाओं के साथ सातवें जैन तीर्थंकर सुपार्श्वनाथ की प्रतिमा भी शामिल थी। उपलब्ध विवरणों के अनुसार यहां से 250 से अधिक प्रतिमाएं मिली थीं।
204 प्रतिमाएं धार किले में, बाकी का क्या?
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सुरक्षा की दृष्टि से 204 प्रतिमाओं को धार किले में रखा गया, लेकिन शेष अवशेषों और प्रतिमाओं के संरक्षण की स्थिति गंभीर है। कई प्रतिमाएं खुले में पड़ी हैं। मौसम की मार, देखरेख के अभाव और प्राकृतिक क्षरण से इनके अस्तित्व पर खतरा बढ़ रहा है।
न गार्ड, न फेंसिंग… तस्करों का खतरा
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बूढ़ी मांडू में न तो नियमित सुरक्षा गार्ड की व्यवस्था दिखाई देती है और न ही पूरे क्षेत्र में तार फेंसिंग है। जंगल और दुर्गम भूभाग के बीच स्थित होने से यहां सुरक्षा का संकट और बढ़ जाता है। स्थानीय स्तर पर प्रतिमाओं के चोरी होने की आशंका और पुरावशेषों की सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई है। स्थल से चोरी या गायब हुई प्रतिमाओं का व्यवस्थित अभिलेख उपलब्ध नहीं होने से स्थिति और गंभीर हो जाती है।
विरासत स्थल तक पहुंचना भी चुनौती
इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखने वाले इस स्थल तक पहुंचने के लिए आज भी कच्चे और पहाड़ी रास्ते से गुजरना पड़ता है। सड़क, बिजली, पेयजल और शौचालय जैसी मूलभूत सुविधाएं तक उपलब्ध नहीं हैं। दुर्गम पहुंच के कारण पर्यटक तो दूर, शोधकर्ताओं और इतिहास में रुचि रखने वालों के लिए भी यहां पहुंचना आसान नहीं है।
मांडू का अतीत, भविष्य की चिंता
बूढ़ी मांडू केवल कुछ टूटे मंदिरों और बिखरी प्रतिमाओं का समूह नहीं है। यह उस सांस्कृतिक और स्थापत्य परंपरा का प्रमाण है, जिसने मांडू को सदियों पहले एक समृद्ध नगरी के रूप में स्थापित किया था। यदि पुरावशेषों का वैज्ञानिक संरक्षण, सुरक्षा, अभिलेखीकरण और स्थल तक पहुंच की व्यवस्था जल्द नहीं की गई तो आने वाली पीढ़ियों के लिए बूढ़ी मांडू केवल इतिहास की किताबों में बची एक कहानी बनकर रह जाएगी।
एक नजर में बूढ़ी मांडू
- मांडू से दूरी : करीब 4 किमी
- क्षेत्र : सोडपुर का जंगल
- प्राचीन नाम : मांडवगढ़, तरंगगढ़
- प्रमुख काल : परमार, राष्ट्रकूट और प्रतिहार
- प्रमुख खोज : 1980
- मिली प्रतिमाएं : 250 से अधिक
- धार किले में रखी गईं : 204
- प्रमुख प्रतिमाएं : शिव, गणेश, विष्णु, सुपार्श्वनाथ
- प्रमुख अवशेष : मंदिर, परकोटा, घाट, तालाब, शाही परिसर
बचाने के लिए पांच जरूरी कदम
- पूरे पुरातात्विक क्षेत्र की तार फेंसिंग
- चौबीस घंटे सुरक्षा व्यवस्था
- सभी प्रतिमाओं और अवशेषों का डिजिटल अभिलेखीकरण
- पहुंच मार्ग और मूलभूत सुविधाओं का विकास
- पुरातात्विक स्थल का वैज्ञानिक संरक्षण और नियमित निरीक्षण