
शैलेंद्र लड्ढा, नईदुनिया न्यूज, सुसारी (धार)। नर्मदा नदी पर गुजरात में बने सरदार सरोवर परियोजना को लेकर तीन दशकों से चल रहे विवाद का समाधान मध्यप्रदेश के 192 डूब प्रभावित गांवों और 90 पुनर्वास स्थलों के लिए निराशाजनक साबित हुआ है।
प्रदेश सरकार ने राज्य की 55 प्रतिशत डूबी भूमि के बदले गुजरात सरकार पर सात हजार 669 करोड़ रुपये का जो दावा किया था, वह खारिज हो गया। इसके विपरीत बांध की लागत में हुई वृद्धि के एवज में अब मध्यप्रदेश सरकार को 550 करोड़ रुपये गुजरात सरकार को देने होंगे। पिछले 10 वर्षों से डूब क्षेत्र और पुनर्वास स्थलों की समस्याओं के समाधान के लिए जिस राशि की उम्मीद की जा रही थी, वह अब नहीं मिल पाएगी। ऐसे में यहां की समस्याओं का समाधान कैसे होगा, यह अभी तय नहीं है।
सरदार सरोवर बांध से जुड़े चार राज्यों की मंगलवार को दिल्ली में केंद्र सरकार की मध्यस्थता में बैठक हुई। इसमें मध्यप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र और गुजरात के मुख्यमंत्री शामिल हुए। बैठक में हुए समझौते के साथ 30 वर्षों से चला आ रहा विवाद समाप्त हो गया। समझौते के तहत मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र और राजस्थान सरकारें गुजरात सरकार को कुल एक हजार 650 करोड़ रुपये देंगी, जिसमें मध्यप्रदेश का हिस्सा 550 करोड़ रुपये है।
प्रदेश में सरदार सरोवर बांध के डूब क्षेत्र में शासकीय भूमि, संपत्ति, वन और खनिज संपदा के डूब में आने के बाद वर्ष 2019 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने इन सभी का सर्वे कराया था। इसके बाद गुजरात सरकार से सात हजार 669 करोड़ रुपये की राशि की मांग की गई थी। प्रदेश सरकार द्वारा तैयार की गई सूची पर गुजरात सरकार ने आपत्ति दर्ज कराई, जिसके बाद मामला केंद्रीय नर्मदा ट्रिब्यूनल बोर्ड के पास पहुंच गया। जिन स्थानों पर गुजरात ने आपत्ति दर्ज कराई थी, वहां की वास्तविक स्थिति जानने के लिए गत वर्ष प्रदेश सरकार की ओर से नियुक्त आर्बिट्रेटर एवं पूर्व मुख्य सचिव अलका सिरोही ने भी निरीक्षण किया था।
नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध गुजरात में स्थित है और उसका पूरा नियंत्रण भी गुजरात के पास है। परियोजना का सबसे बड़ा लाभार्थी भी गुजरात ही है। इसके विपरीत बांध में डूबी कुल भूमि का 55 प्रतिशत हिस्सा मध्यप्रदेश का है। वर्ष 2014 में बांध की ऊंचाई बढ़ाए जाने के कारण प्रदेश की लगभग 5000 हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि डूब में आ गई और प्रभावित गांवों की संख्या 178 से बढ़कर 192 हो गई। इसी आधार पर मध्यप्रदेश ने 2013 के भूमि अधिग्रहण कानून के तहत बाजार भाव के अनुसार सात हजार 669 करोड़ रुपये का दावा किया था। वहीं गुजरात सरकार वर्ष 2001 की दरों के आधार पर केवल 288 करोड़ रुपये देने पर अड़ी हुई थी।
पिछले 30 वर्षों से विवाद इस बात को लेकर था कि मध्यप्रदेश डूब में आए गांवों की भूमि, संपत्ति और अन्य परिसंपत्तियों का मुआवजा बढ़ी हुई दरों से मांग रहा था। दूसरी ओर गुजरात सरकार का तर्क था कि बांध का निर्माण तय समय पर पूरा नहीं हो सका और विरोध तथा कानूनी विवादों के कारण इसकी लागत काफी बढ़ गई। इसलिए गुजरात सरकार ने बांध से जुड़े अन्य तीन राज्यों से बढ़ी हुई लागत में हिस्सेदारी की मांग की थी। अब समझौते के बाद अन्य राज्यों के दावे खारिज हो गए हैं और तीनों राज्यों को गुजरात को राशि देना पड़ेगी।
सरदार सरोवर बांध के डूब प्रभावित 192 गांवों में से करीब 35 प्रतिशत गांवों में आज भी हजारों परिवार डूब क्षेत्र में रह रहे हैं। ये परिवार पिछले एक दशक से न तो पूरी तरह डूब क्षेत्र से बाहर आ सके हैं और न ही पुनर्वास की समस्याओं का समाधान हो पाया है। प्रदेश सरकार पिछले पांच वर्षों से यह कहती रही कि गुजरात सरकार से दावा की गई राशि मिलने के बाद डूब प्रभावितों की समस्याओं का समाधान किया जाएगा तथा पुनर्वास स्थलों के अधूरे विकास कार्य पूरे किए जाएंगे, लेकिन अब स्थिति उलट गई है। प्रदेश सरकार का सात हजार 669 करोड़ रुपये का दावा खारिज हो गया है और उलटे उसे 550 करोड़ रुपये गुजरात सरकार को देने होंगे। ऐसे में डूब प्रभावितों और पुनर्वास स्थलों की समस्याओं के समाधान की उम्मीद फिलहाल और दूर होती नजर आ रही है।