
Shiva Temple in MP: बदनावर (नईदुनिया न्यूज)। बदनावर नगर धर्म और आस्था का बड़ा केंद्र रहा है। मध्यकाल से पूर्व बदनावर वर्धमानपुर के नाम से जाना जाता था। प्रसिद्ध तीर्थ कोटेश्वर महादेव धाम में भगवान श्रीकृष्ण ने रुक्मणि हरण के दौरान यहां विश्राम किया था और अपने हाथों से शिवलिंग की स्थापना की थी। इसी तरह यहां पर महाभारत कालीन एकवीरा देवी का मंदिर भी हैं, जिन्हें पांडवों की कुलदेवी भी कहा जाता है। यहां के कुछ गांव के नाम भी महाभारत के पात्र भीमपुरा, अर्जुनखेड़ी आदि है।
इसी प्रकार यहां से प्राप्त पुरातात्विक अवशेषों के अध्ययन से ज्ञात हुआ है कि पांचवीं शताब्दी में जैन धर्म के अनुयायियों का खासा आना जाना यहां बना हुआ था। इसी तरह छटी शताब्दी में निर्मित उड़िया शैली का बैजनाथ महादेव मंदिर नगर की पहचान ही बन चुका है, लेकिन मंदिर संरक्षण को लेकर पुरातत्व विभाग दिलचस्पी नहीं दिखा रहा है, जिससे मंदिर के पत्थरों का क्षरण होने से इसकी प्राचीनता को खतरा उत्पन्न होने लगा है।
आठ साल पहले किए गए केमिकल संरक्षण के बाद इसकी सुध नहीं ली गई। यदि समय रहते इसके कायाकल्प की ओर ध्यान नहीं दिया गया तो जल्द ही इमारत खंडहर में तब्दील हो जाएगी। नगर के प्रवेश द्वार स्थित करीब डेढ़ हजार वर्ष पुराना पाषाण निर्मित बाबा बैजनाथ महादेव का मंदिर हजारों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है। श्रावण मास में सुबह से शाम तक श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। विशिष्ट अवसरों पर भांग और पंचमेवा, अक्षत, मावा, पुष्प, बिल्व पत्र आदि से श्रृंगार किया जाता है।
शिवलिंग के दर्शन मात्र से लोगों की मनोकामना पूरी होती है। भूमिज शैली के उत्कृष्ट उदाहरण इस मंदिर में बैजनाथ महादेव मंदिर के वेदीबंध, जंघा और शिखर शिल्प शास्त्र के अनुसार बनाए गए हैं। मंदिर पर सुंदर नक्काशी के साथ देवताओं की आकृतियां उकेरी गई हैं। मंदिर को परमारकालीन भी बताया जाता है। स्थानीय लोगों में इसे उड़िया मंदिर के नाम से जाना जाता है। इसलिए इस प्राचीन इमारत को पुरातत्व विभाग ने साल 1984 से अपने अधीन संरक्षित किया है, ताकि वह मंदिर की प्राचीनता का अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए समय-समय पर काम कर सके, किंतु बीते कुछ वर्षों में मंदिर का पत्थर काला पड़ने लगा है।
पुरातत्वविद् बताते हैं कि पत्थर पर जमने वाली काई के सूखने पर कालापन आने लगता है। यह आमतौर पर मौसम के प्रकोप का परिणाम भी होता है, जो पत्थर पर धीरे-धीरे प्रकट होता है। बहरहाल कई जगह से पत्थर रेत के बारीक कणों के रूप में झड़ रहा है। मंदिर की दीवारों में भी दरारें बढ़ने लगी हैं और मंदिर पर घास और पौधे उग आए हैं। फिर भी लंबे समय से न तो पुरात्तव विभाग और न ही प्रशासन द्वारा इस प्राचीन इमारत के अस्तित्व को बचाने में कोई दिलचस्पी दिखा रहा है। जबकि मंदिर का सभा मंडप और कुछ हिस्सा तो काफी पहले समय गिर चुका है।
इमारत पर 2014 के बाद केमिकल नहीं किया
पुरातत्व विभाग ने साल 2007 में इसका जीर्णोद्धार किया तथा तब पत्थरों के क्षरण को रोकने के लिए रासायनिक प्रक्रिया से उपचार कर गर्भगृह की मरम्मत की तथा तड़ी चालक भी लगाया गया। इधर-उधर बिखरी प्राचीन प्रतिमाओं को यथा स्थान रखने के लिए पेडीस्टर बनाए गए तथा मंदिर के आसपास मजबूती प्रदान करने के लिए लाल फर्श लगाया था। एक ओर पत्थर की बाउंड्रीवाल बनाई गई। इसके बाद दिसंबर 2014 में एक बार फिर से केमिकल संरक्षण करवाया और परिसर में पेयजल के लिए हैंडपंप लगवाया था।
अप्रैल 2015 में रोड साइड की बाउंड्रीवाल बनाई गई थी और परिसर में पेवर्स लगाए गए। इसके बाद इस इमारत का अस्तित्व बचाने के प्रति विभाग ने गंभीरता नहीं दिखाई। जिससे यह धीरे-धीरे कमजोर हो रही है। स्थानीय जनसहयोग से जरूर इसके आसपास श्रद्धालुओं के लिए विशेष व्यवस्थाएं जुटाकर काम किए गए। अब जब चहुंओर की प्राचीन इमारतों का कायाकल्प कर विकास किया जा रहा है। एेसे में नगरवासियों को भी नगर की पहचान इस इमारत के कायाकल्प की आस लगी है।
विभाग के अधीन संरक्षित प्राचीन बैजनाथ महादेव की इमारत का इंजीनियर ने निरीक्षण कर लिया है। चूंकि इमारत की वर्तमान दशा को देखते हुए कार्य अधिक है। इसलिए अब पुनः विभाग की टीम को अवलोकन के लिए संभवतः इसी माह भेजा जाएगा। टीम की रिपोर्ट के आधार पर कार्य स्वीकृति के लिए भोपाल भेजे जाएंगे। -पी. प्रांजपेई, उपसंचालक, पुरातत्व विभाग इंदौर