
आशीष शुक्ला, नईदुनिया, डिंडौरी। सालबोरर कीट 27 वर्ष बाद एक बार फिर अमरकंटक के आसपास हरे-भरे क्षेत्र को वीरान करने पर तुला हुआ है। हालत यह हैं कि डिंडौरी जिले में अमरकंटक से लगे वन क्षेत्र में अब तक 35 हजार से अधिक साल के पेड़ प्रभावित हो चुके हैं। वहीं अनूपपुर जिले के अमरकंटक वन परिक्षेत्र में 15 हजार से अधिक साल के पेड़ काटने के लिए वन विभाग ने चिह्नित किए हैं। प्रभावित पेड़ों को चिह्नित करने का अभियान 31 जनवरी तक चलाया जाएगा। ऐसे में प्रभावित पेड़ों का यह आंकड़ा और भी बढ़ेगा।
सालबोरर तने के अंदर घुसकर पेड़ को खोखला कर देता है। यह कीट वर्षा के मौसम में ही पेड़ से बाहर आते हैं। लिहाजा पेड़ काटकर ही इन्हें नष्ट किया जा सकता है। बड़ी संख्या में पेड़ों के काटने से मां नर्मदा नदी के उद्गम स्थल क्षेत्र अमरकंटक में वन क्षेत्र का रकबा अधिक प्रभावित होगा।
डिंडौरी जिले के ग्राम कबीर, तरबर टोला, बांग्लादादर, खरीडीह सहित आसपास के जंगल अधिक प्रभावित हैं। वन विभाग ने दो माह पहले सालबोरर से प्रभावित पांच हजार पेड़ चिह्नित किए थे, जिन्हें काटने का काम चल रहा है।
सालबोरर कीट बसाहट क्षेत्र के नजदीक पेड़ों को अधिक नुकसान पहुंचा रहे हैं। सूत्रों की मानें तो एक लाख से अधिक पेड़ चपेट में आ चुके हैं। जो पेड़ कम प्रभावित हैं, उनकी निगरानी वन विभाग कर रहा है। छत्तीसगढ़ से लगे हुए अचानकमार संरक्षित क्षेत्र में भी पेड़ प्रभावित हुए हैं। संरक्षित क्षेत्र होने के चलते यहां पेड़ चिह्नित नहीं किए जा रहे।
वर्ष 1998 में भी सालबोरर कीट ने अमरकंटक के आसपास पेड़ों को अधिक प्रभावित किया था। वन विभाग ने उस समय आदिवासियों के माध्यम से सालबोरर कीट मरवाये थे। तब वन विभाग ने आदिवासी जनजाति के लोगों से किलो के भाव से कीट खरीदे थे।
अमरकंटक से लगे पूर्व करंजिया वन परिक्षेत्र में सालबोरर कीट का असर ज्यादा है। 35 हजार से अधिक साल के पेड़ प्रभावित हो चुके हैं। 31 जनवरी तक पेड़ चिह्नित किए जाएंगे। इसके बाद प्रभावित पेड़ों की स्पष्ट जानकारी शासन स्तर को भेजी जाएगी। - पुनीत सोनकर, डीएफओ सामान्य डिंडौरी