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एक मां का दोहरा दर्द: पहले 15 साल का इकलौता बेटा फंदे पर झूला, फिर उसी की हत्या के आरोप में जाना पड़ा जेल

गुना के किशोर की मौत के बहुचर्चित मामले में हाईकोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने पल्टा निचली अदालत का फैसला। कड़ी टिप्पणी भी की।

By Virendra TiwariEdited By: Roman Tiwari
Publish Date: Wed, 25 Feb 2026 12:48:04 AM (IST)Updated Date: Wed, 25 Feb 2026 06:53:26 AM (IST)
एक मां का दोहरा दर्द: पहले 15 साल का इकलौता बेटा फंदे पर झूला, फिर उसी की हत्या के आरोप में जाना पड़ा जेल
इकलौते बेटे की मौत के मामले में निचली अदालत ने मां को माना था दोषी

HighLights

  1. बेटे के मौत के मामले में निचली अदालत ने मां को भेजा जेल
  2. एमपी हाई कोर्ट ने मामले में निचली अदालत का फैसला पलटा
  3. हाई कोर्ट ने निचली अदालत की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की

नवदुनिया प्रतिनिधि, गुना: एक मां के लिए अपनी आंखों के सामने अपने इकलौते जवान बेटे का शव देखना दुनिया का सबसे बड़ा दुख होता है। लेकिन गुना की अलका जैन के लिए यह दुख यहीं खत्म नहीं हुआ। जिस बेटे की मौत के सदमे से वह उबर भी नहीं पाई थीं, उसी बेटे की हत्या के आरोप में पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया।

अब जाकर मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय की ग्वालियर खंडपीठ ने इस मामले में दखल देते हुए अलका जैन पर लगे सभी आरोपों को निरस्त कर दिया है और निचली अदालत की कार्यप्रणाली पर कड़ी टिप्पणी की है।

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14 फरवरी का वह मनहूस दिन

अलका जैन की शादी 1 जून 2006 में भोपाल में बैंक में पदस्थ अनुपम जैन से हुई थी। 1 फरवरी 2011 को उनके घर एक बेटे (अभ्युदय) का जन्म हुआ। पति के तबादले के कारण अलका अपने 15 वर्षीय बेटे के साथ गुना में रह रही थीं। 14 फरवरी 2025 की सुबह अलका ने अपने घर के बाथरूम में अपने इकलौते बेटे को फंदे से लटकता हुआ पाया। बदहवास मां उसे लेकर तुरंत जिला अस्पताल दौड़ी, लेकिन डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।


शोक मनाने की मोहलत भी नहीं मिली, बन गईं कातिल

पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट (15 फरवरी 2025) में मौत की वजह 'गला घोंटना' बता दिया गया। इसी आधार पर गुना पुलिस ने 22 फरवरी 2025 को अज्ञात के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता की धारा 103 (हत्या) के तहत मामला दर्ज किया। जांच में सीधे मां (अलका) को ही आरोपी मानते हुए 8 मार्च 2025 को उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। हालांकि, बाद में 16 जून 2025 को उच्च न्यायालय से उन्हें नियमित जमानत मिल गई थी।

पिता की गुहार और पुलिस की दोषमुक्ति रिपोर्ट

इस अन्याय के खिलाफ अलका के पति ने पुलिस मुख्यालय में शिकायत की। इसके बाद पुलिस अधीक्षक, गुना द्वारा एक विशेष जांच दल का गठन किया गया। जांच में यह बात सामने आई कि अभ्युदय अपनी पढ़ाई को लेकर अवसाद में था। उसके अंक लगातार गिर रहे थे; पांचवीं कक्षा में 89.5 प्रतिशत से गिरकर सातवीं में 64.7 प्रतिशत रह गए थे।

विशेष जांच दल ने साफ कहा कि मां के खिलाफ कोई सबूत नहीं है। पुलिस महानिरीक्षक, उप महानिरीक्षक और पुलिस अधीक्षक की मंज़ूरी के बाद अदालत में 'खात्मा रिपोर्ट' पेश कर दी गई।

निचली अदालत की जिद और उच्च न्यायालय से मिला इंसाफ

कहानी में नया मोड़ तब आया जब गुना के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने पुलिस की इस रिपोर्ट को खारिज कर दिया। 9 मई 2025 को बिना किसी ठोस सबूत के, महज कुछ शंकाओं (जैसे- मां ही घर में थी, उसने ही फंदा काटा, आदि) के आधार पर मजिस्ट्रेट ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 103 और 238 के तहत संज्ञान लेते हुए मां पर मुकदमा चलाने का आदेश दे दिया।

आखिरकार, यह मामला उच्च न्यायालय पहुंचा

9 फरवरी 2026 को न्यायमूर्ति मिलिंद रमेश फड़के की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया:

  • निचली अदालत का फैसला पूरी तरह से 'काल्पनिक धारणाओं' पर आधारित था।
  • चिकित्सा विशेषज्ञों की 19 अप्रैल 2025 की रिपोर्ट में साफ़ था कि आँखों में खून उतरना फांसी लगाने और गला घोंटने, दोनों ही स्थितियों में हो सकता है, जिसे निचली अदालत ने नजरअंदाज कर दिया।
  • मकान मालकिन (नेहा जैन) के बयान को भी मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने अनदेखा किया, जिसमें उन्होंने साफ बताया था कि घटना के वक्त घबराहट में अलका ने चाबियों के गुच्छे से खुद चाबी ढूंढी थी।

यह भी पढ़ें- जबलपुर में पत्नी को फोन पर Voice Massage भेजकर कहा 'तलाक तलाक तलाक', पति के खिलाफ FIR दर्ज

उच्च न्यायालय ने 9 मई 2025 के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश को रद्द करते हुए अलका जैन के खिलाफ चल रही पुलिस थाना कोतवाली गुना की सभी आपराधिक कार्रवाइयों (अपराध क्रमांक 115/2025) को हमेशा के लिए निरस्त कर दिया है। कानून की नज़र में तो अलका अब आज़ाद हैं, लेकिन अपने इकलौते बेटे को खोने और समाज में कातिल कहलाने का जो दर्द उन्होंने झेला है, उसकी भरपाई शायद कोई अदालत नहीं कर सकती।