ADPO के 10% प्रमोशन कोटे पर हाई कोर्ट ने फैसला रखा सुरक्षित, DPC परिणाम सीलबंद रखने के निर्देश
ग्वालियर हाई कोर्ट ने एडीपीओ पद पर मंत्रालयीन कर्मचारियों के 10 प्रतिशत पदोन्नति कोटे को चुनौती देने वाली याचिका पर फैसला सुरक्षित रखा। डीपीसी परिणाम ...और पढ़ें
Publish Date: Thu, 08 Oct 2026 08:39:54 AM (IST)Updated Date: Thu, 08 Oct 2026 08:39:54 AM (IST)
ADPO के 10% प्रमोशन कोटे पर हाई कोर्ट ने फैसला रखा सुरक्षित। (एआई जनरेटेड)HighLights
- ग्वालियर हाई कोर्ट में एडीपीओ पदोन्नति कोटे पर सुनवाई हुई।
- तीन घंटे की बहस के बाद फैसला सुरक्षित रखा।
- आठ अक्टूबर को डीपीसी बैठक आयोजित करने की अनुमति मिली।
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। सहायक जिला लोक अभियोजन अधिकारी (एडीपीओ) के पद पर मंत्रालयीन कर्मचारियों के लिए निर्धारित 10 प्रतिशत पदोन्नति कोटे को चुनौती देने वाली याचिका पर हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने बुधवार को सुनवाई हुई।
तीन घंटे बहस चलने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि गुरुवार को प्रस्तावित विभागीय पदोन्नति समिति (डीपीसी) की बैठक हो सकती है, लेकिन समिति की सभी सिफारिशों को सीलबंद रखा जाएगा। फैसला आने तक इन सिफारिशों पर कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी।
डीपीसी के परिणाम सीलबंद रखने के निर्देश
- न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया और न्यायमूर्ति अनुराधा शुक्ला की युगलपीठ ने करन श्रीवास्तव व अन्य की याचिका पर यह आदेश दिया। सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एमपीएस रघुवंशी ने न्यायालय को बताया कि आठ अक्टूबर को डीपीसी होने जा रही है। यदि डीपीसी की प्रक्रिया पर रोक नहीं लगाई गई तो बाद में जटिलता पैदा हो सकती है।
इस पर न्यायालय ने कहा कि चूंकि मामले में सुनवाई पूरी हो चुकी है और निर्णय आने में कुछ समय लग सकता है, इसलिए विभाग डीपीसी की प्रक्रिया आगे बढ़ा सकता है। हालांकि, डीपीसी के सभी परिणाम सीलबंद रखे जाएंगे और न्यायालय का फैसला आने तक उसकी सिफारिशों पर अमल नहीं किया जाएगा। नियम संशोधन और 10 प्रतिशत कोटे को चुनौती
- याचिका में 14 अक्टूबर 2002 के उस नियम संशोधन को चुनौती दी गई है, जिसके माध्यम से एडीपीओ के पद पर मंत्रालयीन/लिपिकीय संवर्ग के कर्मचारियों के लिए 10 प्रतिशत पदोन्नति कोटा निर्धारित किया गया है।
- याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि पूर्व में एडीपीओ पद पर 100 प्रतिशत सीधी भर्ती लोक सेवा आयोग की प्रतियोगी परीक्षा के माध्यम से होती थी। उनका कहना है कि अभियोजन का काम विशेषज्ञ कानूनी कार्य है, इसलिए केवल लिपिकीय अनुभव के आधार पर पदोन्नति का प्रविधान उचित नहीं है।