
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। डबरा स्थित बौद्ध विहार-अंबेडकर पार्क के पते पर जाली दस्तावेजों के आधार पर पांच बांग्लादेशी नागरिकों के पासपोर्ट बनवाए जाने के मामले में पुलिस फंसती नजर आ रही है। एसटीएफ की जांच में पता चला है कि जिन पतों पर कोई स्थायी निवासी रहता ही नहीं था, वहां भी पुलिस ने बिना भौतिक सत्यापन निवास किए जाने की रिपोर्ट दे दी।
एसआईटी की जांच में सत्यापन फॉर्म के साथ अनिवार्य रूप से लगाया जाने वाला 'पंचनामा' ही गायब पाया गया। एसटीएफ के अधिकारियों ने संबंधित पुलिसकर्मियों से इस गंभीर चूक पर पूछताछ की, तो उन्होंने कोरोना काल का हवाला देकर पल्ला झाड़ने की कोशिश की।
तर्क दिया कि उस समय महामारी के कारण सोशल डिस्टेंसिंग का नियम लागू था, जिसके चलते स्थानीय लोगों या पड़ोसियों का भौतिक पंचनामा तैयार नहीं किया गया। जांच एजेंसियां इस सफाई से संतुष्ट नहीं हैं और मामले में पुलिसकर्मियों की मिलीभगत की आशंका व्यक्त की जा रही है।
अब तक गिरफ्तार आरोपितों से पूछताछ में पासपोर्ट बनवाने वाले इस नेटवर्क के मुख्य सूत्रधारों के बीच पैसों के लेनदेन का भी ब्योरा मिला है। नेटवर्क का मास्टरमाइंड रियाल चौधरी बांग्लादेशी नागरिकों को भारतीय पासपोर्ट दिलाने के बदले 35 से 40 हजार रुपये वसूलता था। इसमें से 20 हजार रुपये स्थानीय नेटवर्क संभालने वाले नसीम अख्तर को दिए जाते थे। नसीम की पुलिस रिमांड अवधि पूरी होने के बाद उसे अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया है।
भोपाल पासपोर्ट सेवा केंद्र का कर्मचारी भी रडार पर- जांच का दायरा अब भोपाल स्थित पासपोर्ट सेवा केंद्र तक पहुंच गया है। घटना के समय वहां कार्यरत रहा एक कर्मचारी एसटीएफ की निशाने पर है। बताया जा रहा है कि संबंधित कर्मचारी का तबादला हाल ही में पंजाब-हरियाणा बॉर्डर के एक जिले के पासपोर्ट सेवा केंद्र में हुआ है। एसटीएफ जल्द ही कर्मचारी से पूछताछ की तैयारी में है, जिससे इस अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय फर्जीवाड़े के कई अन्य बड़े चेहरों का पर्दाफाश होने की संभावना है।
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