
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। फर्जी दस्तावेजों के आधार पर नौकरी हासिल करने के आरोप से जुड़े मामले में हाई कोर्ट की युगलपीठ ने कर्मचारी की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने टिप्पणी की कि विभागीय जांच को लंबित रखने के लिए ऐसे दस्तावेज मांगे जा रहे हैं, जिनका मामले के निर्णय से कोई संबंध नहीं है।
नियुक्ति जिन दस्तावेजों के आधार पर हासिल की गई, उनकी प्रामाणिकता साबित करने की जिम्मेदारी संबंधित कर्मचारी की भी है।
न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया और न्यायमूर्ति पुष्पेंद्र यादव की युगलपीठ ने डॉक्टर गिरजा शंकर गुप्ता की पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया।
याचिकाकर्ता ने 22 अक्टूबर 2026 को पारित आदेश के एक हिस्से पर आपत्ति जताई थी। उसका कहना था कि मांगे गए सभी दस्तावेज उसे उपलब्ध नहीं कराए गए, जबकि आदेश में दस्तावेज दिए जाने का उल्लेख किया गया है।
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कोर्ट ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए पाया कि विभाग ने चार दिसंबर 2025 के पत्र में आरोपों का विवरण और संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराने की जानकारी दी थी। इसके बाद कर्मचारी ने 10 दिसंबर को कुछ अन्य दस्तावेज मांगे थे। युगलपीठ के अनुसार मांगे गए दस्तावेजों का विभागीय जांच के मुख्य मुद्दे से कोई सीधा संबंध नहीं था।
जांच में यह तय होना है कि नौकरी पाने के लिए प्रस्तुत दस्तावेज वास्तविक थे या कूटरचित। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जांच से संबंधित महत्वपूर्ण दस्तावेज उपलब्ध न कराने पर कार्यवाही प्रभावित हो सकती है, लेकिन अप्रासंगिक दस्तावेजों की अनुपलब्धता के आधार पर पूरी जांच को निरस्त नहीं किया जा सकता।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता रिकॉर्ड में ऐसी कोई त्रुटि नहीं बता सके, जिसके आधार पर पूर्व आदेश की समीक्षा की जा सके। इसके बाद याचिका खारिज कर दी गई।
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