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ग्वालियर में सांदीपनि स्कूल में बच्चों के लिए बस सेवा नहीं हुई शुरू, पढ़ाई का संकट गहराया

मध्य प्रदेश के सांदीपनि स्कूलों में ढाई महीने बाद भी बस सेवा शुरू नहीं हुई। 512 रूट प्रभावित हैं, जिससे खासकर ग्रामीण और छोटे विद्यार्थियों को स्कूल प...और पढ़ें

By Anil TomarEdited By: Anurag Mishra
Publish Date: Fri, 18 Sep 2026 09:07:27 AM (IST)Updated Date: Fri, 18 Sep 2026 09:12:09 AM (IST)
ग्वालियर में सांदीपनि स्कूल में बच्चों के लिए बस सेवा नहीं हुई शुरू, पढ़ाई का संकट गहराया
ग्वालियर में सांदीपनि स्कूल में बच्चों के लिए बस सेवा शुरू नहीं। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. सांदीपनि स्कूलों में ढाई महीने बाद बसें नहीं चलीं।
  2. ग्वालियर संभाग के आठ जिलों में समस्या बनी है।
  3. विद्यार्थियों के लिए 512 रूट पर बसें चलनी हैं।

नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर: मध्य प्रदेश सरकार की महत्वाकांक्षी योजना के तहत शुरू किए गए सांदीपनि स्कूलों में छात्रों के आवागमन के लिए वाहन सेवा का संकट बना हुआ है। स्कूल शुरू हुए ढाई महीने से अधिक का समय बीत चुका है। ग्वालियर-चंबल अंचल सहित प्रदेश के कई जिलों में विद्यार्थियों को स्कूल लाने और ले जाने के लिए बस सेवा शुरू नहीं हो सकी है।

बस ऑपरेटरों को राजी करने में नाकाम

हाल ही में आयुक्त लोक शिक्षण ने सभी जिला शिक्षा अधिकारियों को जिला स्तर पर ही वैकल्पिक व्यवस्था बनाने और स्थानीय बस ऑपरेटरों के साथ समन्वय स्थापित कर जल्द से जल्द बस संचालन शुरू करने के कड़े निर्देश दिए थे। इसके बावजूद स्थानीय स्तर पर जिला शिक्षा अधिकारी बस ऑपरेटरों को राजी करने में पूरी तरह नाकाम साबित हो रहे हैं।


512 रूट पर स्कूल बसों को चलाया जाना है

यहां बता दें कि ग्वालियर शिक्षा संभाग में आठ जिले आते हैं। इनमें ग्वालियर में आठ, मुरैना में आठ, भिंड में सात, शिवपुरी में आठ, श्योपुर में तीन, दतिया में चार, गुना में छह व अशोक नगर में तीन सांदीपनि स्कूल हैं। इन सभी स्कूलों में छात्रों को लाने ले जाने के करीब 512 रूट हैं, जिन पर स्कूल बसों को चलाया जाना है।

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स्कूलों के मर्जर से बढ़ा संकट

  • वाहनों की व्यवस्था न होने से सबसे बड़ी परेशानी ग्रामीण अंचल के छोटे-छोटे बच्चों को हो रही है। दरअसल शिक्षा विभाग ने सांदीपनि स्कूलों के 15 किलोमीटर के दायरे में आने वाले प्राथमिक और माध्यमिक सरकारी स्कूलों को इनमें मर्ज कर दिया है।

  • पुराने स्कूल बंद होने के बाद अब 10 से 15 किलोमीटर दूर गांवों में रहने वाले छोटे बच्चों के सामने रोजाना स्कूल पहुंचने की गंभीर चुनौती है। गरीब और किसान परिवारों के लिए रोजाना निजी वाहनों या आटो से बच्चों को भेजना आर्थिक रूप से संभव नहीं है।
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