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6 अगस्त को लौटने का था वादा... लेकिन तिरंगे में लिपटकर घर आए सूबेदार राणा, शहीद की भावुक कर देने वाली कहानी

पाकिस्तानी सैनिक लगातार हमले कर रहे थे। ऐसे ही एक अभियान के दौरान कुपवाड़ा सेक्टर में सूबेदार नरेंद्र सिंह राणा ने दुश्मन का डटकर मुकाबला किया सर्वोच्च बलिदान दे दिया।

By Anoop BhargavEdited By: Dheeraj Belwal
Publish Date: Sat, 25 Jul 2026 08:34:51 PM (IST)Updated Date: Sat, 25 Jul 2026 08:34:51 PM (IST)
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6 अगस्त को लौटने का था वादा... लेकिन तिरंगे में लिपटकर घर आए सूबेदार राणा, शहीद की भावुक कर देने वाली कहानी
तिरंगे में लिपटकर घर आए सूबेदार राणा।

HighLights

  1. कारगिल विजय दिवस पर याद आए सूबेदार नरेंद्र सिंह राणा
  2. कुपवाड़ा में घुसपैठियों से लोहा लेते हुए दिया था बलिदान
  3. ग्वालियर के शहीद नरेंद्र सिंह की भावुक कर देने वाली कहानी

नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। मैं छह अगस्त को घर आ रहा हूं... यह वादा सूबेदार नरेंद्र सिंह राणा ने अपनी आखिरी चिट्ठी में पत्नी से किया था। परिवार ने घर लौटने की तैयारियां भी शुरू कर दी थीं। बच्चों को पिता के आने का इंतजार था, लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था। 5 अगस्त 1999 को जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा में पाकिस्तानी घुसपैठियों से लड़ते हुए वह वीरगति को प्राप्त हो गए।

अगले दिन छह अगस्त को वह घर तो लौटे, लेकिन तिरंगे में लिपटे हुए। कारगिल विजय दिवस की 26वीं वर्षगांठ पर ग्वालियर का यह परिवार आज भी उस आखिरी चिट्ठी और उससे जुड़े वादे को याद कर भावुक हो उठता है।


मातृभूमि की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दिया

तीन मई 1999 को शुरू हुए कारगिल युद्ध का आधिकारिक समापन 26 जुलाई को भारत की विजय के साथ हुआ, लेकिन सीमा पर हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हुए थे। पाकिस्तानी सैनिक लगातार हमले कर रहे थे। ऐसे ही एक अभियान के दौरान कुपवाड़ा सेक्टर में सूबेदार नरेंद्र सिंह राणा ने दुश्मन का डटकर मुकाबला किया और पांच अगस्त 1999 को मातृभूमि की रक्षा करते हुए सर्वोच्च बलिदान दे दिया।

21 साल की उम्र में पहनी थी वर्दी

12 दिसंबर 1955 को ग्वालियर के मुरार स्थित घोसीपुरा में जन्मे नरेंद्र सिंह राणा बचपन से ही सेना में जाने का सपना देखते थे। महज 21 वर्ष की आयु में 12 जुलाई 1976 को भारतीय सेना में भर्ती हुए। राष्ट्रीय राइफल्स में रहते हुए उन्होंने राजस्थान, जम्मू-कश्मीर सहित देश के विभिन्न क्षेत्रों में सेवा दी और अंत तक अपने कर्तव्य का निर्वहन किया।

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एक हफ्ते बाद पहुंची आखिरी चिट्ठी

शहीद के बेटे मृगेंद्र सिंह राणा बताते हैं कि युद्ध समाप्त होने के बाद पूरा परिवार उनके लौटने का इंतजार कर रहा था। इसी बीच छह अगस्त की सुबह सेना से उनके शहीद होने की सूचना मिली। उसी दिन शाम को उनका पार्थिव शरीर ग्वालियर पहुंचा।

सबसे भावुक पल तब आया, जब शहादत के करीब एक सप्ताह बाद उनकी आखिरी चिट्ठी घर पहुंची। उस पत्र में उन्होंने बच्चों के स्कूल में दाखिले, किताबों, यूनिफॉर्म और घर की गाय का हाल पूछा था। साथ ही लिखा था कि छह अगस्त को घर पहुंच जाऊंगा।

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