MP High Court ने परिवहन प्राधिकरण के अध्यक्ष की नियुक्ति पर लगी रोक हटाई, सरकार के फैसले पर कोर्ट की मुहर
ग्वालियर हाईकोर्ट ने राज्य परिवहन प्राधिकरण के गठन को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। न्यायालय ने 10 अगस्त 2026 की सरकारी अधिसूचना को पूरी तरह...और पढ़ें
Publish Date: Thu, 15 Oct 2026 08:56:43 AM (IST)Updated Date: Thu, 15 Oct 2026 08:56:43 AM (IST)
परिवहन प्राधिकरण के अध्यक्ष की नियुक्ति पर लगी रोक हटी। (एआई जनरेटेड)HighLights
- परिवहन प्राधिकरण के गठन की याचिका खारिज।
- 10 अगस्त की सरकारी अधिसूचना को माना वैधानिक।
- अपर मुख्य सचिव स्तर के अधिकारी बनेंगे अध्यक्ष।
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर : मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की ग्वालियर खंडपीठ ने राज्य परिवहन प्राधिकरण के गठन को लेकर दायर याचिका खारिज कर दी है। न्यायमूर्ति जीएस अहलूवालिया और न्यायमूर्ति अनुराधा शुक्ला की युगलपीठ ने बुधवार को सुनाए फैसले में राज्य सरकार की 10 अगस्त 2026 की अधिसूचना को वैधानिक प्रविधानों के अनुरूप माना है। इसके साथ ही प्राधिकरण के गठन को चुनौती देने वाली याचिका में उठाई गई आपत्तियां खारिज हो गईं।
याचिकाकर्ताओं की आपत्तियां और मांग
मामले में हरिशंकर सिंह पटेल एवं अन्य की ओर से याचिका दायर कर राज्य सरकार की नौ फरवरी 2026 और बाद में जारी 10 अगस्त 2026 की अधिसूचनाओं को चुनौती दी गई थी। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि मोटरयान अधिनियम की धारा 68 के तहत राज्य परिवहन प्राधिकरण का गठन निर्धारित कानूनी प्रविधानों के अनुसार होना चाहिए। उन्होंने यह भी मांग की थी कि प्राधिकरण का मुख्यालय ग्वालियर से बाहर नहीं किया जाए, क्योंकि परिवहन आयुक्त का कार्यालय ग्वालियर में स्थित है।
हाई कोर्ट की रोक और नई अधिसूचना
- मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने 16 जून 2026 को नौ फरवरी की अधिसूचना के प्रभाव और संचालन पर रोक लगा दी थी। राज्य सरकार की ओर से भी अधिसूचना में कुछ अनियमितताओं की बात स्वीकार करते हुए संशोधन की आवश्यकता बताई गई थी।
- इसके बाद सरकार ने 10 अगस्त 2026 को नई अधिसूचना जारी कर राज्य परिवहन प्राधिकरण का पुनर्गठन किया। इस अधिसूचना को भी याचिका में चुनौती दी गई। नई अधिसूचना के तहत राज्य सरकार द्वारा नामित अपर मुख्य सचिव या प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारी को प्राधिकरण का अध्यक्ष और परिवहन आयुक्त को सदस्य बनाया गया है।
न्यायालय की टिप्पणी
- याचिकाकर्ताओं की ओर से तर्क दिया गया कि अधिनियम की धारा 68(1) में पदनाम के आधार पर अधिकारियों को नामित करने का प्रविधान नहीं है। इस पर हाई कोर्ट ने कहा कि प्रविधान के सामान्य अध्ययन से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि प्रत्येक बार अध्यक्ष या सदस्य के लिए किसी व्यक्ति विशेष के नाम से अधिसूचना जारी करना अनिवार्य है।
- न्यायालय ने माना कि अपर मुख्य सचिव या प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारी को अध्यक्ष के रूप में नामित करने की व्यवस्था से किसी अधिकारी के पद छोड़ने पर हर बार नई अधिसूचना जारी करने की आवश्यकता नहीं होगी। न्यायालय ने यह भी कहा कि धारा 68(2) में अध्यक्ष के लिए निर्धारित अनुभव संबंधी शर्तों को ध्यान में रखना आवश्यक है।
अंतरिम रोक का आदेश भी वापस
- युगलपीठ ने निष्कर्ष निकाला कि राज्य सरकार की 10 अगस्त 2026 की अधिसूचना मोटरयान अधिनियम की धारा 68(1) और 68(2) के विपरीत नहीं है। न्यायालय ने अधिसूचना की वैधता बरकरार रखते हुए याचिका खारिज कर दी। इसके साथ ही नई अधिसूचना पर लगाई गई अंतरिम रोक वापस ले ली गई।
- नौ फरवरी की अधिसूचना पर लगी रोक को भी अप्रभावी माना गया, क्योंकि उसे नई अधिसूचना से प्रतिस्थापित किया जा चुका था। हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को कानून के अनुसार आगे की कार्रवाई करने की स्वतंत्रता दी है।
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