
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। ग्वालियर शहर के एक निजी अस्पताल में दुर्लभ बीमारी गुइलेन-बैरे सिंड्रोम (जीबीएस) संदिग्ध मरीज की मौत का मामला सामने आया है। बिरलानगर निवासी 42 वर्षीय युवक प्रदीप की तबीयत बिगड़ने पर छह जनवरी को उसे गोले का मंदिर क्षेत्र स्थित एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। स्वजन के अनुसार इलाज के दौरान युवक की हालत में सुधार नहीं हुआ, जिसके बाद 12 जनवरी को उसे सिटी सेंटर क्षेत्र स्थित एक अन्य निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया।
यहां डॉक्टरों ने उसे जीबीएस का संदिग्ध बताया। युवक ने 14 जनवरी को इलाज के दौरान दमतोड़ दिया। डॉक्टरों के अनुसार, युवक की हालत लगातार गंभीर होती जा रही थी। सांस लेने में परेशानी बढ़ने पर उसे वेंटिलेटर पर रखा गया। हालांकि जीबीएस की आधिकारिक पुष्टि होने से पहले ही इलाज के दौरान युवक की मौत हो गई।
मामले को लेकर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. सचिन श्रीवास्तव ने कहा कि जीबीएस संदिग्ध युवक की मौत की सूचना मिली है। पूरे मामले की जांच के लिए टीम को भेजा है। सभी पहलुओं की जानकारी जुटाई जा रही है।
जीबीएस का इलाज महंगा है। इलाज में खास इंजेक्शन (आइवीआइजी) दिए जाते हैं, जिनकी कीमत 30 हजार रुपये प्रति इंजेक्शन होती है। अक्सर पांच से 10 इंजेक्शन लगाने पड़ते हैं। एक मरीज के इलाज पर 15 लाख रुपये तक खर्च आ सकता है।
न्यूरो फिजिशिशयन डॉ. दिनेश उदेनिया ने बताया कि जुकाम, बुखार या खांसी या कामन कोल्ड होने और उसके सही होने के बाद शरीर के अंदर ही एंटीबाडी वायरस नर्व सिस्टम के खिलाफ काम करने लगते हैं।
ये नर्व सिस्टम को कमजोर करने लगते हैं और व्यक्ति बीमार हो जाता है। यह खतरनाक इसलिए है कि जुकाम, बुखार सही होने के करीब 10 दिन बाद वायरस सक्रिय होता है और इसके विशेष लक्षण नहीं होते। कुछ ही दिन में बीमारी तेजी से बढ़ जाती है और मरीज गंभीर हालत में पहुंच जाता है।
इसमें पैरों में झनझनाहट शुरू होने के बाद घुटने की तरफ बढ़ने लगती है। इसके बाद यह हाथों में होने लगती है। छह हफ्तों में ही विकट स्थिति हो जाती है और मरीज गंभीर बीमार हो जाता है। अस्पताल आने वाले लोगों में से 20 प्रतिशत मरीज गंभीर हालत में पहुंच जाते हैं।
जीबीएस एक ऐसी बीमारी है, जिसमें शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली गलती से अपनी ही नसों पर हमला करने लगती है। इसमें हाथ-पैरों में झुनझुनी और सुन्नपन होता है। कमजोरी पैरों से शुरू होकर पूरे शरीर में फैल सकती है। चलने, बोलने और सांस लेने में दिक्कत आती है। लकवा हो सकता है और मरीज को वेंटिलेटर पर रखना पड़ता है। 10 प्रतिशत मरीजों की मौत भी हो सकती है।