
अनूप भार्गव, नईदुनिया, ग्वालियर। यूटेथ्रल स्ट्रिक्चर (मूत्र मार्ग संकुचन) जैसी जटिल और बार-बार उभरने वाली बीमारी के इलाज में आयुर्वेद की उत्तरबस्ती चिकित्सा ने नई उम्मीद जगाई है। 35 वर्षीय युवक में इस चिकित्सा से मिले सफल परिणाम के बाद केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (सीसीआरएएस) ने इस पद्धति पर शोध प्रोजेक्ट को मंजूरी दी है।
सीसीआरएएस ने प्रोजेक्ट के लिए 12 लाख 97 हजार रुपये का फंड भी जारी कर दिया है। यह शोध क्षेत्रीय आयुर्वेद अनुसंधान संस्थान ग्वालियर की देखरेख में होगा और इसे 18 माह में पूरा किया जाएगा। प्रोजेक्ट के तहत यूटेथ्रल स्ट्रिक्चर से पीड़ित 20 से 25 मरीजों को शामिल किया जाएगा। इन मरीजों पर उत्तरबस्ती चिकित्सा की प्रभावशीलता और सुरक्षा का वैज्ञानिक मूल्यांकन किया जाएगा।
शोध की निगरानी संस्थान के अनुसंधान अधिकारी डा. अनिल मंगल करेंगे। इस शोध में उज्जैन के निजी आयुर्वेद चिकित्सक एसएन पांडे अन्वेषक (इन्वेस्टिगेटर) की भूमिका निभाएंगे। शोध पर कार्य उज्जैन में किया जाएगा।
दरअसल डॉ पांडे द्वारा 35 वर्षीय युवक पर उत्तरबस्ती चिकित्सा से किए गए इलाज के सकारात्मक परिणामों के आधार पर ही यह शोध शुरू किया जा रहा है। युवक का उत्तरबस्ती चिकित्सा से किया गया इलाज जनरल आफ रिसर्च इन आयुर्वेद साइंस में भी चार सितंबर 2025 को प्रकाशित हो चुका है।
35 से 55 वर्ष के पुरुष अधिक प्रभावितचिकित्सकीय आंकड़ों के अनुसार यूटेथ्रल स्ट्रिक्चर रोग प्रति 1 लाख पुरुषों में से लगभग 300 पुरुषों को प्रभावित करता है। यह समस्या अधिकतर 35 से 55 वर्ष की आयु के पुरुषों में देखी जाती है। समय पर उपचार न होने पर यह बीमारी मूत्र त्याग में गंभीर परेशानी के साथ-साथ जीवन की गुणवत्ता को भी प्रभावित कर सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस शोध से आयुर्वेद की उत्तरबस्ती चिकित्सा को वैज्ञानिक मान्यता मिलने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगा। सफल परिणाम आने पर यह पद्धति भविष्य में यूटेथ्रल स्ट्रिक्चर के इलाज का एक प्रभावी विकल्प बन सकती है।
डॉ अनिल मंगल, अनुसंधान अधिकारी, आयुर्वेद संस्थान, ग्वालियर ने कहा कि उत्तरबस्ती चिकित्सा से मूत्र मार्ग संकुचन रोग का स्थायी समाधान संभव है। 35 वर्षीय युवक का इस पद्धति से किए गए उपचार की सफलता के बाद सीसीआरएएस ने इसे प्रोजेक्ट के रूप में स्वीकार किया।