
धर्म डेस्क, नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक शहर ग्वालियर के किले पर स्थित सास-बहू मंदिर भारतीय वास्तुकला, स्थापत्य कला और अद्भुत नक्काशी का एक बड़ा उदाहरण है। पहली बार इसका नाम सुनकर हर किसी के मन में यह सवाल जरूर उठता है कि क्या यह मंदिर सास और बहू के किसी पारिवारिक रिश्ते या आपसी विवाद से जुड़ा है? हालांकि, इतिहास में यह पूरी तरह धार्मिक मान्यताओं, बदलाव और कछवाहा राजवंश के इतिहास से जुड़ा है।
इस मंदिर का नाम 'सहस्रबाहु मंदिर' (Sahastrabahu Temple) था। 'सहस्र' का अर्थ 'हजार' और 'बाहु' का अर्थ 'भुजाएं या हाथ' होता है। यह मंदिर भगवान विष्णु के हजार हाथों वाले स्वरूप को समर्पित था। लेकिन, समय बीतने के साथ स्थानीय लोकबोली (बुंदेली और हिंदी) में 'सहस्रबाहु' शब्द का उच्चारण बदलने लगा। सहस्रबाहु से यह नाम 'सहसबाहू', फिर 'सहसबाहु' और बदलते-बदलते आम लोगों की जुबान पर सास-बहू में बदल गया।
इसे लेकर ग्वालियर अंचल में एक दिलचस्प लोककथा भी काफी प्रसिद्ध है। 11वीं सदी में कछवाहा राजवंश के राजा महिपाल ने अपनी रानी के लिए भगवान विष्णु के 'सहस्रबाहु' रूप का एक भव्य मंदिर बनवाया, क्योंकि रानी भगवान विष्णु की परम भक्त थीं।
जब राजा के पुत्र (राजकुमार) का विवाह हुआ, तो परिवार में आई नई बहू भगवान शिव की अनन्य भक्त थी। बहू की धार्मिक आस्था का आदर करते हुए राजा ने मुख्य विष्णु मंदिर के ठीक बगल में एक थोड़ा छोटा मंदिर बनवाया, जो भगवान शिव को समर्पित था। बड़ा मंदिर सास (रानी) की पूजा के लिए था और छोटा मंदिर बहू के लिए, इसलिए स्थानीय लोग इन दोनों मंदिरों की जोड़ी को बोलचाल में 'सास का मंदिर' और 'बहू का मंदिर' कहने लगे।
इस भव्य मंदिर का निर्माण 1093 ईस्वी (11वीं शताब्दी) में कछवाहा (कच्छपघात) राजा महिपाल द्वारा करवाया गया था। मंदिर परिसर में मौजूद प्राचीन शिलालेख इस बात की पुष्टि करते हैं कि इसका निर्माण राजा महिपाल ने अपनी धार्मिक आस्था और राज्य की सुख-समृद्धि के लिए कराया था।
वास्तुकला की अनोखी तकनीकयह मंदिर परिसर कच्छपघात वास्तुकला शैलीसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। यह पूरा परिसर दो मुख्य मंदिरों का संयोजन है-
बड़ा मंदिर (विष्णु मंदिर / सास मंदिर)-
छोटा मंदिर (शिव मंदिर / बहू मंदिर)-
मध्यकाल में हुए आक्रमणों के दौरान मंदिर के कई हिस्सों और गर्भगृह की मूर्तियों को क्षति पहुंची थी। वर्तमान में मुख्य गर्भगृह में प्राचीन मूर्तियां मौजूद नहीं हैं। आज इस ऐतिहासिक धरोहर की देखरेख भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा की जा रही है। अपनी अद्भुत बनावट और ग्वालियर किले की ऊंचाई से दिखने वाले खूबसूरत नजारों के कारण यह मंदिर दुनियाभर के पर्यटकों, वास्तुशास्त्रियों और इतिहासकारों के लिए आकर्षण का एक प्रमुख केंद्र बना हुआ है।