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ग्वालियर का प्रसिद्ध 'सास-बहू' मंदिर... इसमें छिपा है MP के कछवाहा राजवंश का अनोखा सच, जानकर हैरान रह जाएंगे आप

मध्य प्रदेश के ग्वालियर किले पर स्थित प्रसिद्ध 'सास-बहू' मंदिर का नाम किसी पारिवारिक विवाद से नहीं, बल्कि भगवान विष्णु के 'सहस्रबाहु' स्वरूप से जुड़ा ...और पढ़ें

By Akriti KumariEdited By: Akriti Kumari
Publish Date: Wed, 16 Sep 2026 05:23:16 PM (IST)Updated Date: Wed, 16 Sep 2026 05:23:16 PM (IST)
ग्वालियर का प्रसिद्ध 'सास-बहू' मंदिर... इसमें छिपा है MP के कछवाहा राजवंश का अनोखा सच, जानकर हैरान रह जाएंगे आप
ग्वालियर किले पर स्थित ऐतिहासिक 11वीं सदी का सहस्रबाहु (सास-बहू) मंदिर और इसकी अद्भुत वास्तुकला। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. मंदिर का मूल नाम 'सहस्रबाहु' था, जो समय के साथ 'सास-बहू मंदिर' बन गया
  2. 1093 ईस्वी में कछवाहा राजवंश के राजा ने इस भव्य मंदिर का निर्माण किया था
  3. यह मंदिर लाल बलुआ पत्थर से बना है, जिसमें तीन मंजिल है

धर्म डेस्क, नई दिल्ली। मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक शहर ग्वालियर के किले पर स्थित सास-बहू मंदिर भारतीय वास्तुकला, स्थापत्य कला और अद्भुत नक्काशी का एक बड़ा उदाहरण है। पहली बार इसका नाम सुनकर हर किसी के मन में यह सवाल जरूर उठता है कि क्या यह मंदिर सास और बहू के किसी पारिवारिक रिश्ते या आपसी विवाद से जुड़ा है? हालांकि, इतिहास में यह पूरी तरह धार्मिक मान्यताओं, बदलाव और कछवाहा राजवंश के इतिहास से जुड़ा है।

'सहस्रबाहु' से कैसे बन गया 'सास-बहू'?

इस मंदिर का नाम 'सहस्रबाहु मंदिर' (Sahastrabahu Temple) था। 'सहस्र' का अर्थ 'हजार' और 'बाहु' का अर्थ 'भुजाएं या हाथ' होता है। यह मंदिर भगवान विष्णु के हजार हाथों वाले स्वरूप को समर्पित था। लेकिन, समय बीतने के साथ स्थानीय लोकबोली (बुंदेली और हिंदी) में 'सहस्रबाहु' शब्द का उच्चारण बदलने लगा। सहस्रबाहु से यह नाम 'सहसबाहू', फिर 'सहसबाहु' और बदलते-बदलते आम लोगों की जुबान पर सास-बहू में बदल गया।


सास-बहू नाम से जुड़ी प्रसिद्ध लोककथा

इसे लेकर ग्वालियर अंचल में एक दिलचस्प लोककथा भी काफी प्रसिद्ध है। 11वीं सदी में कछवाहा राजवंश के राजा महिपाल ने अपनी रानी के लिए भगवान विष्णु के 'सहस्रबाहु' रूप का एक भव्य मंदिर बनवाया, क्योंकि रानी भगवान विष्णु की परम भक्त थीं।

जब राजा के पुत्र (राजकुमार) का विवाह हुआ, तो परिवार में आई नई बहू भगवान शिव की अनन्य भक्त थी। बहू की धार्मिक आस्था का आदर करते हुए राजा ने मुख्य विष्णु मंदिर के ठीक बगल में एक थोड़ा छोटा मंदिर बनवाया, जो भगवान शिव को समर्पित था। बड़ा मंदिर सास (रानी) की पूजा के लिए था और छोटा मंदिर बहू के लिए, इसलिए स्थानीय लोग इन दोनों मंदिरों की जोड़ी को बोलचाल में 'सास का मंदिर' और 'बहू का मंदिर' कहने लगे।

इतिहास और निर्माण काल

इस भव्य मंदिर का निर्माण 1093 ईस्वी (11वीं शताब्दी) में कछवाहा (कच्छपघात) राजा महिपाल द्वारा करवाया गया था। मंदिर परिसर में मौजूद प्राचीन शिलालेख इस बात की पुष्टि करते हैं कि इसका निर्माण राजा महिपाल ने अपनी धार्मिक आस्था और राज्य की सुख-समृद्धि के लिए कराया था।

वास्तुकला की अनोखी तकनीकयह मंदिर परिसर कच्छपघात वास्तुकला शैलीसका सर्वोत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है। यह पूरा परिसर दो मुख्य मंदिरों का संयोजन है-

बड़ा मंदिर (विष्णु मंदिर / सास मंदिर)-

  • यह मंदिर तीन मंजिला है और पूरी तरह से लाल बलुआ पत्थर (Sandstone) से बनाया गया है।
  • इसमें चूने या सीमेंट का इस्तेमाल किए बिना पत्थरों को आपस में इंटर-लॉकिंग तकनीक से जोड़ा गया है।
  • मंदिर का मंडप, गर्भगृह और प्रवेश द्वार अत्यंत भव्य हैं। खंभों, छतों और दीवारों पर तराशी गई मूर्तियां भारतीय स्थापत्य कला का बेहतरीन नमूना हैं।

छोटा मंदिर (शिव मंदिर / बहू मंदिर)-

  • यह मुख्य मंदिर के ठीक सामने स्थित है और आकार में थोड़ा छोटा है।
  • यह मुख्य रूप से एक मंजिला संरचना है, लेकिन इसके खंभों और दीवारों की नक्काशी बड़े मंदिर जैसी ही सुंदर और कलात्मक है।

मंदिर में टूरिज्म का कैसा इंतजाम

मध्यकाल में हुए आक्रमणों के दौरान मंदिर के कई हिस्सों और गर्भगृह की मूर्तियों को क्षति पहुंची थी। वर्तमान में मुख्य गर्भगृह में प्राचीन मूर्तियां मौजूद नहीं हैं। आज इस ऐतिहासिक धरोहर की देखरेख भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) द्वारा की जा रही है। अपनी अद्भुत बनावट और ग्वालियर किले की ऊंचाई से दिखने वाले खूबसूरत नजारों के कारण यह मंदिर दुनियाभर के पर्यटकों, वास्तुशास्त्रियों और इतिहासकारों के लिए आकर्षण का एक प्रमुख केंद्र बना हुआ है।

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