
नईदुनिया प्रतिनिधि, ग्वालियर। जिले के सरकारी स्कूलों में 95 प्रतिशत से अधिक शिक्षक वर्तमान में ई-अटेंडेंस और एजुकेशन पोर्टल के माध्यम से अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। हालांकि अब शिक्षकों के सामने एक नई और गंभीर तकनीकी समस्या खड़ी हो गई है। एजुकेशन पोर्टल 3.0 और उससे जुड़े हमारे शिक्षक व जीएफएमएस जैसे मोबाइल ऐप्स पर लॉगिन करते ही शिक्षकों से एक कड़े कानूनी घोषणा एवं डेटा गैर-प्रकटीकरण वचनबद्धता पत्र पर डिजिटल सहमति मांगी जा रही है।
इस अंडरटेकिंग की कठोर शर्तों ने शिक्षकों की चिंता बढ़ा दी है, क्योंकि इससे भविष्य में किसी भी डेटा लीकेज या तकनीकी गड़बड़ी की स्थिति में पूरी जवाबदेही स्वयं शिक्षकों पर ही तय होने का खतरा बन गया है।
शिक्षकों का आरोप है कि ई-अटेंडेंस और एजुकेशन पोर्टल का पूरा ढांचा किसी सीधे पूर्णतः सुरक्षित सरकारी सर्वर के बजाय प्राइवेट कंपनियों के डिजिटल प्लेटफार्म्स के माध्यम से संचालित हो रहा है। हाल ही में शिक्षकों द्वारा डेटा सुरक्षा और निजता के हनन को लेकर जबलपुर उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की गई है। शिक्षकों का कहना है कि हाईकोर्ट में मामला पहुंचते ही ऐप पर अचानक इस प्रकार का कानूनी वचनबद्धता पत्र पाप-अप के रूप में दिखाई देने लगा है।
शिक्षकों का कहना है कि अटेंडेंस तो वे लगा रहे हैं, लेकिन एप में कई तकनीकी खामी है। जिन्हें विभाग दूर नहीं कर पा रहा है। कभी एप में लाग इन होते हैं तो लाग आउट नहीं हो पाते। कभी-कभी स्कूल में पहुंचने के बाद भी एप उनकी स्कूल से काफी दूरी बता देता है। जिससे उनकी उपस्थिति नहीं लग पाती। शनिवार को उपस्थिति लगाने के बाद भी एप की तरफ से मैसेज आया कि उनकी उपस्थिति नहीं लगी है और वे स्कूल में अनुपस्थित है।
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शिक्षक नीरज सोलंकी का तर्क है कि यदि वे इस अंडरटेकिंग पर सहमति देते हैं और किसी थर्ड-पार्टी सर्वर या साइबर हमले के कारण डेटा लीक हो जाता है, तो ऐप का संचालन करने वाली कंपनी या विभाग अपनी जिम्मेदारी से बच निकलेगा और सारा दोष शिक्षकों के सिर मढ़ा जाएगा। जिले के शिक्षक संगठन के पदाधिकारी अरविंद दीक्षित ने शासन से मांग की है कि इस एकतरफा अंडरटेकिंग को तुरंत हटाया जाए और डेटा सुरक्षा की पूर्ण जिम्मेदारी संबंधित विभाग व तकनीकी एजेंसी खुद ले।