
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। भागीरथपुरा दूषित पानी कांड एक दिन की चूक का नतीजा नहीं है, बल्कि यह सालों से चली आ रही लापरवाही का परिणाम है। नगर निगम के अधिकारी समय रहते जाग जाते तो दूषित पानी से 36 मौतें नहीं होतीं। हाई कोर्ट के आदेश पर गठित एक सदस्यीय जांच आयोग की रिपोर्ट में सीवरेज और पेयजल नेटवर्क की गलत प्लानिंग, कमजोर निगरानी, खराब रखरखाव, शिकायतों पर कार्रवाई न करने और पाइप बदलने में हुई लंबी टेंडर प्रक्रिया को हादसे का कारण बताया है।
आयोग ने 18 अगस्त 2026 को रिपोर्ट तीन सीलबंद लिफाफों में हाई कोर्ट पटल पर रख दी थी। कोर्ट के आदेश पर बुधवार 30 सितंबर को इसे हाई कोर्ट की साइट पर अपलोड किया गया। आयोग ने पानी की गुणवत्ता, पाइप लाइन की स्थिति, दूषित पानी को लेकर हुई शिकायतों, अस्पताल रिकॉर्ड, मौतों की वजह, अधिकारियों के बयान, टेंडर प्रक्रिया इत्यादि को अपनी जांच के दायरे में रखा था।
जांच में यह बात भी सामने आई है कि दिसंबर के अंतिम सप्ताह की शुरुआत में ही भागीरथपुरा में उल्टी, दस्त, पेट दर्द के मरीज सामने आने लगे थे। लोग बदबूदार, काले और गंदे पानी की शिकायतें लगातार कर रहे थे। पार्षद कमल वाघेला ने भी अधिकारियों को शिकायतों की जानकारी दी, लेकिन कार्रवाई नहीं हुई। तीन जनवरी 2026 को प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने पानी के 52 नमूने लिए थे।
इनमें 50 टोटल कोलीफार्म पाजिटिव और 40 में ई-कोलाई मिला। कोलीफार्म 1.8 से 430 और ई-कोलाई 1.8 से 26 तक मिला, जबकि पीने के पानी में ये दोनों होना ही नहीं चाहिए। 29 दिसंबर से छह फरवरी के बीच लिए 24 नमूनों में से 18 असंतोषजनक मिले थे। एमजीएम मेडिकल कॉलेज की जांच में 24 में से 19 नमूने पीने योग्य नहीं पाए गए। इससे भी गंभीर बात यह कि 2025 में नगर निगम द्वारा जांचे गए 73 नमूनों में 54 मानकों से बाहर थे और 39 में फीकल कोलीफार्म मिला था।
भागीरथपुरा कांड में 36 लोगों की मौत हुई थी। अस्पताल रिकॉर्ड के आधार पर आयोग ने इनमें से 22 लोगों की मौतें दूषित पानी (महामारी) की वजह से होना पाई है। शेष के बारे में मौत की वजह अस्पष्ट है। रिपोर्ट के अनुसार, भागीरथपुरा और आसपास के क्षेत्रों से बड़ी संख्या में मरीज उल्टी, दस्त, पेट दर्द, बुखार और डिहाइड्रेशन जैसी शिकायतों के साथ अस्पताल पहुंचे थे।
चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय के रिकॉर्ड में 38 बच्चों के भर्ती होने का उल्लेख है। इनमें तीव्र गैस्ट्रोएंटेराइटिस, डिहाइड्रेशन और तीव्र दस्त का निदान किया गया। वहीं एमजीएम मेडिकल कालेज के रिकार्ड के अनुसार 43 मरीज भर्ती हुए और बाद में गैस्ट्रोएंटेराइटिस से पीड़ित पाए गए। आयोग के समक्ष चिकित्सकों ने भी बताया कि अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों में एक जैसे लक्षण दिखाई दे रहे थे और बड़ी संख्या में मरीज गैस्ट्रोएंटेराइटिस से पीड़ित थे।
मेडिकल रिकॉर्ड और उपलब्ध जांचों में ई-कोलाई सहित अन्य रोगजनक बैक्टीरिया की मौजूदगी का उल्लेख है। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि दूषित पानी के सेवन से गैस्ट्रोएंटेराइटिस होने की संभावना चिकित्सकीय और वैज्ञानिक साक्ष्यों से पुष्ट होती है।
जांच में यह बात भी सामने आई है कि भागीरथपुरा में कई जगह सीवर और पेयजल लाइनें समांतर, क्रास और ओवरलैप थीं। कुछ जगह सीवर लाइन पेयजल पाइप के ऊपर थी। रिपोर्ट में सीपीएचईईओ मानकों के संदर्भ में दोनों प्रणालियों के बीच दस मीटर दूरी और सीवर लाइन को पेयजल लाइन के नीचे रखने की बात सामने आई, लेकिन मौके पर इसका पालन नहीं हुआ।
नगर निगम के इंजीनियरों ने भी माना कि निर्धारित दूरी नहीं रखी गई और तकनीकी मानक अपनाए जाते तो घटना टाली जा सकती थी। सीवर में रिसाव और ओवरफ्लो तथा पेयजल लाइन में निगेटिव प्रेशर ने दूषित पानी को पेयजल नेटवर्क में खिंचने का रास्ता बनाया।
आयोग ने पुराने प्रोजेक्ट के डिजाइन और निर्माण से जुड़े तकनीकी अधिकारी तथा नगर निगम के रखरखाव अधिकारियों की भूमिका जांच योग्य मानी। नगर निगम के कार्यपालन यंत्री संजीव कुमार श्रीवास्तव वर्ष 2013 से 2026 तक जलप्रदाय विभाग के कार्यपालन यंत्री रहे। उन्हें जर्जर पाइप, रिसाव और नेटवर्क की स्थिति पर निगरानी तथा प्रिवेंटिव मेंटेनेंस सुनिश्चित करना था, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया।
सहायक यंत्री सरोज कुमार प्रजापति अगस्त 2017 से जून 2025 तक जोन-4, भागीरथपुरा के प्रभारी रहे। उन्हें लीकेज, पाइप क्षति, अनधिकृत कनेक्शन, सीवर-पानी लाइन की नजदीकी, बदबू और पानी की गुणवत्ता संबंधी शिकायतों की जानकारी थी, लेकिन उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की।
आयोग ने जांच में यह भी पाया है कि नई पाइप लाइन के टेंडर में भी देरी हुई। टेंडर जारी करने में, एमआइसी तक पहुंचने में, एमआइसी से स्वीकृति मिलने में, अनुबंध होने में हर स्तर पर देरी हुई। पाइप लाइन का काम मई 2024 में ही पूरा हो जाना था, लेकिन यह दो वर्ष देरी से हुआ। ठेकेदार एजेंसी मालवा इंजीनियरिंग और तत्कालीन ईई संजीव श्रीवास्तव की निगरानी पर भी आयोग ने सवाल उठाए हैं।
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आयोग ने पेयजल और सीवर लाइन में कम से कम 3 मीटर दूरी रखने, पानी की लाइन को सीवर से आधा से एक मीटर ऊपर रखने, क्रासिंग पर प्रोटेक्टिव केसिंग-कांक्रीट शिल्डिंग, जीआइएस मैपिंग, पुराने पाइपों का चरणबद्ध बदलाव करने, नियमित सुरक्षा आडिट करने, रियल टाइम लीकेज-प्रेशर मानिटरिंग और नियमित बैक्टीरियोलाजिकल जांच जैसे कई सुझाव दिए हैं।
बदबूदार या संदिग्ध पानी की शिकायत होने की स्थिति में 24 घंटे में सैंपल लेने, लैब टेस्ट, संदिग्ध पाइप-बोरवेल बंद, टैंकर व सेफ वाटर प्वाइंट, फ्लशिंग, क्लोरीनेशन, क्रास-कनेक्शन सुधार, मेडिकल टीम और जनता को तत्काल सूचना देने के लिए भी कहा है।
आयोग ने शहरी जल आपूर्ति प्राधिकरण गठित करने की अनुशंसा भी की है। आयोग ने सुझाव दिया है कि इस प्राधिकरण का अध्यक्ष किसी रिटायर हाई कोर्ट जज या रिटायर मुख्य सचिव स्तर के अधिकारी को बनाया जाए। इसके अलावा मृतकों के स्वजन को 10 लाख, अंतिम संस्कार के लिए 50 हजार, बच्चों की शिक्षा के लिए पांच लाख तक, गंभीर बीमारी पर दो लाख, स्थायी नुकसान पर तीन लाख, मामूली बीमारी पर 50 हजार, चिकित्सा खर्च की प्रतिपूर्ति और प्रभावित परिवारों को पांच वर्ष तक मुफ्त चिकित्सा सुविधा व नियमित स्वास्थ्य शिविर की अनुशंसा भी की गई है।