
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। भागीरथपुरा दूषित पानी कांड की जांच कर रहा एक सदस्यीय न्यायिक आयोग छह माह बाद भी यह नहीं बता सका कि दूषित पानी कांड किस वजह से हुआ था और इसके पीछे किसकी लापरवाही थी। आयोग को सोमवार को रिपोर्ट पेश करना थी, लेकिन न आयोग की तरफ से कोई उपस्थित हुआ न कोई सूचना दी गई। आयोग क्या कर रहा है, जांच कहां तक पहुंची, इसकी भी कोई जानकारी कोर्ट को नहीं दी गई।
भागीरथपुरा मामले को लेकर हाई कोर्ट में चल रही पांच जनहित याचिकाओं की सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बागड़िया ने याचिकाकर्ताओं का पक्ष रखते हुए कहा कि दूषित पानी की वजह से 36 लोगों की मौत हो गई और पुलिस ने एफआईआर दर्ज करना तो दूर आज तक किसी से पूछताछ तक नहीं की।
कोर्ट ने एक सदस्यीय आयोग को सिविल कोर्ट के समान अधिकार दिए, लेकिन यह एक सदस्यीय आयोग आपराधिक मामले की जांच कैसे करेगा यह किसी को नहीं पता। उन्होंने मामले में गैर इरादतन हत्या का केस दर्ज करने की मांग की। कोर्ट ने तर्क सुनने के बाद आदेश सुरक्षित रख लिया।
सोमवार दोपहर करीब आधा घंटा मामले में सुनवाई चली। एडवोकेट बागड़िया ने तर्क रखते हुए कहा कि कोर्ट ने 27 जनवरी 2026 को एक सदस्यीय आयोग गठित किया था, लेकिन यह क्या कर रहा है, जांच कहां तक पहुंची किसी को नहीं पता। हालत यह है कि आयोग के बारे में जानकारी देने वाला कोई प्रवक्ता कोर्ट में उपस्थित नहीं है। इंदौर में 110 टंकियां हैं, लेकिन सिर्फ भागीरथपुरा टंकी से ही दूषित पानी वितरित हुआ था। हादसे में 36 लोगों की मौत हुई थी, लेकिन कोई जांच नहीं हुई। पुलिस को सूचना देना तक जरूरी नहीं समझा गया।
हादसे को छह माह से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन निगम ने सुपरवाइजर स्तर के तीन कर्मचारियों को निलंबित किया और एक अधिकारी को ट्रांसफर किया। इसके अलावा कोई कार्रवाई नहीं हुई। पानी की टंकी से दूषित पानी वितरित हुआ था या वितरण लाइन में लीकेज की वजह से पानी दूषित हुआ था यह आज भी स्पष्ट नहीं है। भागीरथपुरा टंकी से पानी वितरण की व्यवस्था पांच लोग संभालते हैं, लेकिन इनसे पूछताछ की जरूरत भी महसूस नहीं की गई।
निगम की ओर से एडवोकेट ऋषि तिवारी ने कहा कि हादसे के बाद भागीरथपुरा क्षेत्र में 25 किमी वितरण लाइन बदली जा चुकी है। निगम ने एक सदस्यीय आयोग द्वारा चाहे गए सभी दस्तावेज उपलब्ध करवा दिए हैं। सुनवाई के दौरान एडवोकेट मनीष यादव ने कहा कि भागीरथपुरा में 36 अप्राकृतिक मौत हुई, लेकिन पुलिस ने मर्ग कायम करना तक जरूरी नहीं समझा। उन्होंने मर्ग कायम कर जांच की मांग की। कोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद आदेश सुरक्षित रख लिया।
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