
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर : भागीरथपुरा दूषित पानी कांड को लेकर हाई कोर्ट में प्रस्तुत एक सदस्यीय आयोग की जांच रिपोर्ट में रोज नए-नए तथ्य सामने आ रहे हैं। निगम के अधिकारियों ने खुद आयोग के सामने स्वीकारा है कि भागीरथपुरा क्षेत्र की पानी और ड्रेनेज लाइन के नक्शे और दस्तावेज निगम के पास नहीं है।
वर्ष 2010 में ये नक्शे और दस्तावेज नष्ट हो गए थे। ऐसे में अब सवाल उठ रहा है कि आखिर नगर निगम पिछले डेढ दशक से क्षेत्र की लाइनों का रखरखाव कैसे कर रहा था। निगम ने इस बात का भी कोई रिकार्ड आयोग के सामने पेश नहीं किया कि उसने पाइप लाइनों के सुधार कार्य में क्या किया। लाइन फूटने की कितनी शिकायतें उसे मिली थी और जब लाइनों का रिकार्ड ही नहीं था तो रखरखाव किस तरह से किया जा रहा था।
दिसंबर 2025 के अंत में भागीरथपुरा में बड़ी संख्या में उल्टी-दस्त के मरीज मिले थे। जांच में यह बात सामने आई थी कि दूषित पानी की वजह से लोगों की तबीयत बिगड़ी थी। दूषित पानी की वजह से 36 मौत भी हुई। मामले को लेकर हाई कोर्ट में आधा दर्जन जनहित याचिकाएं चल रही हैं।
इन्हीं याचिकाओं की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने एक सदस्यीय जांच आयोग गठित किया था। जांच आयोग ने 500 पेज से ज्यादा की रिपोर्ट पिछले दिनों प्रस्तुत भी कर दी है। याचिकाओं से जुड़े अधिवक्ता इस रिपोर्ट का अध्ययन कर रहे हैं। इसी अध्ययन में निगम की लापरवाही सामने आ रही है।
वकीलों के मुताबिक आयोग ने अंतिम 110 पेज में अपनी जांच का निष्कर्ष लिखा है। आयोग का कहना है कि भागीरथपुरा दूषित पानी कांड लंबी लापरवाही की वजह से हुआ। समय रहते पाइप लाइनों का रखरखाव किया जाता तो घटना को टाला जा सकता था। यह बात भी सामने आई कि पाइप लाइनों को बदलने के लिए जारी टेंडर को जिम्मेदारों ने जानबूझकर अटकाए रखा। नगर निगम के पास जब यही जानकारी नहीं है कि कौनसी लाइन कहां जा रही है तो फिर रखरखाव कैसे हो रहा था यह समझा जा सकता है।