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भागीरथपुरा कांड : पूरी व्यवस्था ही ‘दूषित’, सीवर-पानी व्यवस्था से लेकर पाइप लाइन बदलने तक कई स्तरों पर चूक

भागीरथपुरा में दूषित पानी से बीमारी और मौतें किसी एक अधिकारी की चूक का नतीजा नहीं थीं, बल्कि पूरी व्यवस्था ही दूषित थी। बुधवार को हाई कोर्ट की साइट पर...और पढ़ें

By Kuldeep BhawsarEdited By: Ramnath Mutkule
Publish Date: Wed, 30 Sep 2026 05:46:35 PM (IST)Updated Date: Wed, 30 Sep 2026 05:51:14 PM (IST)
भागीरथपुरा कांड : पूरी व्यवस्था ही ‘दूषित’, सीवर-पानी व्यवस्था से लेकर पाइप लाइन बदलने तक कई स्तरों पर चूक
भागीरथपुरा में दूषित जल से हुई मौतों के बाद बदली गई पाइप लाइन। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. जांच रिपोर्ट ने रखरखाव, निगरानी और निर्णय प्रक्रिया में देरी को भी जिम्मेदारी की कड़ी माना
  2. तीन दशक में तैयार हुई चूकों की पूरी श्रृंखला सामने रखी है
  3. पानी एक दिन में दूषित नहीं हुआ, व्यवस्था की चूकें वर्षों में जमा होती रहीं

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर : भागीरथपुरा में दूषित पानी से बीमारी और मौतें किसी एक अधिकारी की चूक का नतीजा नहीं थीं, बल्कि पूरी व्यवस्था ही दूषित थी। बुधवार को हाई कोर्ट की साइट पर अपलोड हुई एक सदस्यीय न्यायिक जांच आयोग की रिपोर्ट ने तीन दशक में तैयार हुई चूकों की पूरी श्रृंखला सामने रखी है।

सीवर और जलापूर्ति लाइनों की खामी से लेकर वर्षों तक निगरानी और रखरखाव में कमी, शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई न होने और पाइप लाइन बदलने की प्रक्रिया में हुई लंबी देरी तक। यानी पानी एक दिन में दूषित नहीं हुआ, व्यवस्था की चूकें वर्षों में जमा होती रहीं और आखिरकार इसका परिणाम बीमारी और मौतों के रूप में सामने आया।


कुछ स्थानों पर सीवर लाइन पानी की लाइन के ऊपर तक थी

रिपोर्ट के अनुसार भागीरथपुरा में सीवर नेटवर्क 1990 से 1995 के बीच और जलापूर्ति पाइप लाइन 1999 से 2004 के बीच बिछाई गई। जांच में सामने आया कि कई स्थानों पर दोनों नेटवर्क समानांतर चल रहे थे, कुछ जगह एक-दूसरे को पार कर रहे थे। दोनों के बीच निर्धारित दूरी भी नहीं थी। कुछ स्थानों पर सीवर लाइन पानी की लाइन के ऊपर तक थी। आयोग ने इसे दूषित पानी के प्रवेश के लिए गंभीर तकनीकी जोखिम माना। यानी खतरा अचानक दिसंबर 2025 में पैदा नहीं हुआ था। उसकी जमीन पाइप लाइन बिछने के समय ही तैयार हो गई थी।

तकनीकी नहीं, संस्थागत विफलता

जांच में अधिकारियों और स्थानीय लोगों के बयान सामने आए कि क्षेत्र में पानी की पाइप लाइन में लीकेज, खराबी और पानी की गुणवत्ता को लेकर शिकायतें होती रही थीं। आयोग ने पाया कि जलापूर्ति नेटवर्क की पर्याप्त मैपिंग, संवेदनशील स्थानों की पहचान, लीकेज की निगरानी और समय पर सुधार की व्यवस्था प्रभावी नहीं थी। रिपोर्ट ने इसे केवल तकनीकी नहीं, संस्थागत विफलता भी माना है।

पाइप बदलने की फाइल चली, पानी से तेज नहीं

पाइप लाइन बदलने की प्रक्रिया 2022 में शुरू हुई, लेकिन इससे पहले फाइलें और टेंडर ही लंबी प्रक्रिया में उलझते रहे। जांच आयोग ने अलग-अलग चरणों में हुई देरी को दर्ज किया है।

पहला टेंडर

  • टेंडर जारी करने में : 39 दिन की देरी
  • एमआइसी स्तर पर निर्णय में : 63 दिन
  • अनुबंध की प्रक्रिया में : करीब 94 दिन
  • निर्धारित पूर्णता : मई 2024
  • वास्तविक पूर्णता : जनवरी 2026

आयोग के आकलन में विभिन्न चरणों को मिलाकर कुल असामान्य देरी 859 दिन से अधिक रही। रिपोर्ट ने टेंडर शाखा, संबंधित इंजीनियरिंग अधिकारियों, प्रशासनिक स्तर, पर्यवेक्षण व्यवस्था और ठेकेदार की भूमिका को अलग-अलग देखा है।

126 दिन बाद तय हुआ… टेंडर फिर से होगा

दूसरे टेंडर में वित्तीय बोली 22 अगस्त 2024 को खोली गई। इसके बाद दोबारा टेंडर की सिफारिश 26 दिसंबर 2024 को हुई। यानी निर्णय की प्रक्रिया में करीब 126 दिन लगे।

फिर 94 दिन समिति तक पहुंचने में

तीसरे टेंडर की प्रक्रिया में भी गति नहीं आई। तकनीकी और वित्तीय बोली की प्रक्रिया पूरी होने के बाद मामला टेंडर समिति के सामने रखने में करीब 94 दिन लगे।

निष्कर्ष: तीन टेंडर, सैकड़ों दिन की प्रक्रिया और जनवरी 2026 में जाकर बदली पाइप लाइन, जबकि पहला काम मई 2024 तक पूरा होना था।

जांच आयोग को नहीं मिला पूरा रिकॉर्ड

जांच आयोग को पुराने सीवर और जलापूर्ति नेटवर्क के मूल नक्शे, वर्क ऑर्डर, माप पुस्तिका, निरीक्षण रिकॉर्ड, पूर्णता प्रमाणपत्र उपलब्ध नहीं कराए जा सके। आयोग ने कहा कि रिकॉर्ड की अनुपलब्धता ने यह तय करना कठिन बना दिया कि मूल निर्माण में किस स्तर पर क्या चूक हुई थी।

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