
कुलदीप भावसार, नईदुनिया, इंदौर : जिन बाजारों में रोजाना हजारों की संख्या में लोगों की आवाजाही बनी रहती है, उन्हीं के सुविधाघर असुविधा से भरे पड़े हैं। सुविधाघरों के स्वच्छता सर्वे के अंतर्गत हमने शहर के व्यस्त बाजारों का निरीक्षण किया।
पाया कि सुविधाघर के नाम पर नगर निगम ने ढांचे तो खड़े कर दिए, रखरखाव के नाम पर लाखों रुपये भी खर्च भी हो रहे हैं, लेकिन वास्तविकता यह है कि इन सुविधाघरों की साफ-सफाई पर निगम का ध्यान ही नहीं है। हालत यह है कि बाजारों में बने 90 प्रतिशत से ज्यादा सुविधाघर बदहाल हैं।
इन सुविधाघरों में पानी तो है ही नहीं। छत पर टंकियां रखी भी हैं तो सिर्फ दिखाने के लिए। इंदौर प्रदेश की व्यवसायिक राजधानी है। प्रदेश के अलग-अलग शहर से रोजाना हजारों लोग इन बाजारों में पहुंचते हैं। दुकानदारों के साथ-साथ बड़ी संख्या में पहुंचने वाले ग्राहकों को भी इन सुविधाघरों का उपयोग करना पड़ता है।
ऐसे में सवाल उठता है कि जब अन्य शहरों से आए व्यापारी और आमजन हमारे शहर के बदबूदार और गंदगी से अटे पड़े सुविधाघरों का इस्तेमाल करते होंगे तो वे क्या छवि लेकर अपने शहर को जाते होंगे। सिर्फ स्वच्छ सर्वे से पहले सुविधाघरों के हालात सुधारने से कुछ नहीं होगा।
जरूरत है इन सुविधाघरों को सालभर स्वच्छ बनाए रखने की। निगम के कर्ताधर्ताओं ने अब भी ध्यान नहीं दिया तो देश के सबसे स्वच्छ शहर के ये बदबूदार और गंदगी से अटे पड़े सुविधाघर पूरे देश में शहर की छवि को धूमिल कर देंगे।
सुविधाघरों की साफ-सफाई नियमित होना चाहिए। शहर में बड़ी संख्या में अन्य शहरों से व्यापारी आते हैं। वे क्या सोचते होंगे। - सलमान हुसैन
नगर निगम को चाहिए कि कम से कम इस तरफ तो ध्यान दे। बदबूदार और गंदे सुविधाघर पूरे शहर की छवि खराब कर रहे हैं। - अमानत अली
जरूरी है कि सुविधाघरों की बदहाली की जिम्मेदारी तय की जाए। सिर्फ स्लोगन लिखने और वाहवाही लूटने से कुछ नहीं होगा। - अंकित सोनी
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