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'धार भोजशाला मंदिर नहीं है बल्कि...', हाई कोर्ट में 2 घंटे चली तीखी बहस, आपसी सौहार्द से हल निकालने पर चर्चा

धार भोजशाला के मामले पर शनिवार को दो घंटे से ज्यादा समय तक हाई कोर्ट में बहस चली। आपसी सौहार्द के साथ इस मामले का हल निकालने की याचिका पर बहस पूरी हो ...और पढ़ें

By Lokesh SolankiEdited By: Dheeraj Belwal
Publish Date: Sat, 18 Apr 2026 09:07:59 PM (IST)Updated Date: Sat, 18 Apr 2026 09:07:59 PM (IST)
'धार भोजशाला मंदिर नहीं है बल्कि...', हाई कोर्ट में 2 घंटे चली तीखी बहस, आपसी सौहार्द से हल निकालने पर चर्चा
धार भोजशाला के मामले पर लगातार सुनवाई जारी।

HighLights

  1. मामले में हुई हाई कोर्ट में तीखी बहस
  2. सभी पक्षों को दिया सुनने का भरोसा
  3. सोमवार को भी जारी रहेगी इसपर बहस

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। धार भोजशाला के मामले पर शनिवार को दो घंटे से ज्यादा समय तक हाई कोर्ट में बहस चली। आपसी सौहार्द के साथ इस मामले का हल निकालने की याचिका पर जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की युगलपीठ के सामने बहस पूरी हो गई। इसी दौरान इंटरविनर बने धार के नागरिकों द्वारा दायर आपत्ति पर भी पक्ष रखा गया।

आपत्तिकर्ताओं ने कहा कि भोजशाला मंदिर है इसका कोई प्रमाण कोर्ट में प्रस्तुत नहीं किया गया। जो कोर्ट में बताया गया है, उसमें साफ है ये मंदिर नहीं है, ये एक स्कूल (पाठशाला) थी। शाला का मतलब स्कूल होता है न कि कोई मंदिर। सोमवार को भी आपत्तिकर्ताओं की बहस हाई कोर्ट में जारी रहेगी।


ऐतिहासिक दस्तावेजों पर सवाल

शनिवार को आपसी सहमति से विवाद समाप्त करने की गुजारिश वाली याचिका पर वरिष्ठ अभिभाषक एके चितले ने पक्ष रखा। उन्होंने लगभग पौन घंटे तक बात रखी। इस दौरान उन्होंने यहां आपसी सहमति से ऐसा रास्ता निकालने की गुजारिश की जिससे दोनों ही पक्षों में भाईचारा बना रहे। उनके बाद धार के ही रहने वाले जिब्रान अंसारी, फिरोज और अयाज की ओर से दायर आपत्ति पर उनके वकील सैय्यद अशहार अली वारसी ने बात रखना शुरू की। उन्होंने इसको लेकर दायर याचिकाओं पर ही सवाल खड़ा कर दिया। उन्होंने कोर्ट के समक्ष पहले कई दस्तावेज पेश किए, उसके बाद अपनी बात रखना शुरू की।

वाग्देवी की मूर्ति का तर्क

उन्होंने भोजशाला को मंदिर बताए जाने पर आपत्ति ली। उनका कहना था कि ये 700 सालों से मस्जिद है और वहां नमाज हो रही है। वहीं दूसरी ओर इसे मंदिर बताया जा रहा है, जबकि ये मंदिर ही नहीं है। सभी पक्षों ने जो बात रखी है, उसमें इसे स्कूल बताया गया है। स्कूल और मंदिर में अंतर होता है, ऐसे में इसे मंदिर बताते हुए जो दावा लगाया गया है, वो ही गलत है।

इसके अलावा उन्होंने कोर्ट में कहा कि इसको संस्कृत स्कूल या मंदिर जिस कागज के आधार पर बताया जा रहा है, वो ब्रिटिश अफसरों का है। इसके साथ ही उन्होंने लंदन म्यूजियम में रखी वाग्देवी की मूर्ति को लेकर तो सीधे याचिका दायर करने वाले हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस और अन्य पर सवाल खड़े कर दिए।

पुराने गजट नोटिफिकेशन का हवाला

उन्होंने कोर्ट में कहा कि कोर्ट में ये बात तो रखी गई कि लंदन म्यूजियम में रखी मूर्ति धार से लाई गई थी। लेकिन उसी दस्तावेज में दर्ज इस बात को कोर्ट से छुपाया गया कि ये मूर्ति भोजशाला से नहीं बल्कि सिटी पैलेस से लाई गई थी। सिटी पैलेस और भोजशाला में काफी दूरी है। उन्होंने इस दौरान कोर्ट से तथ्य छुपाने का आरोप भी लगाया। इसके साथ ही उन्होंने 1935 के धार रियासत के गजट नोटिफिकेशन और 1904 के अधिनियम में इस जगह को मस्जिद के रूप में बताए जाने का ऐतिहासिक उल्लेख भी कहा है।

वहीं उन्होंने इस इमारत को लेकर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के डायरेक्टर द्वारा 1952 में जारी दस्तावेज को भी कोर्ट में पेश किया, जिसमें उन्होंने उस समय इसको लेकर उठे विवाद के दौरान साफ कहा था कि ये जगह मस्जिद है न कि मंदिर है।

पूजा स्थल अधिनियम 1991

1991 एक्ट के बाद विवाद ही नहीं हो सकता, वहीं उन्होंने 1991 के पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 के प्रावधानों का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें साफ है कि 1947 में जो धार्मिक स्थल जिस रूप में था उसी रूप में मान्य होगा। उस समय भी यहां मस्जिद थी और नमाज पढ़ी जा रही थी। इसमें केवल राम जन्मभूमि को ही बाहर रखा गया था, क्योंकि उसका उस समय केस चल रहा था। वहीं सुप्रीम कोर्ट के आदेश भी उन्होंने कोर्ट में रखे जिसमें कोर्ट ने अधिनियम के इन प्रावधानों को सही माना था। उन्होंने इस केस को लेकर ही सवाल खड़े कर दिए।

मालिकाना हक और कानूनी फोरम पर सवाल

एक बार वक्फ हमेशा वक्फ, इसके साथ ही उन्होंने वक्फ एक्ट को भी कोर्ट के समक्ष रखते हुए कहा कि एक्ट के मुताबिक कोई संपत्ति एक बार वक्फ घोषित हो जाती है तो वो हमेशा वक्फ ही रहती है। इसको लेकर कोई आपत्ति है तो उसके लिए वे उचित फोरम पर जाएं, वक्फ ट्रिब्यूनल में उसका दावा दाखिल करें। इस जमीन पर हक जताया गया है जो कि गलत है। ये संपत्ति संरक्षित इमारत है और इसका मालिकाना हक फिलहाल एएसआई के पास है।

मामला संपत्ति अधिकार का है और इसका अधिकार केवल सिविल कोर्ट को है। इसके लिए इन्हें धार जिला न्यायालय में सिविल सूट दायर करना था। हमने वहां सिविल सूट दायर किया है। इन्हें कोई आपत्ति है तो वहां पर जवाब दाखिल करें। यहां दायर केस का कोई अर्थ नहीं है। ये उचित फोरम पर नहीं जा रहे हैं, केवल कानून का मजाक बना रहे हैं और कोर्ट का समय बर्बाद कर रहे हैं।

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दावों की कानूनी पुष्टि

दावे कर रहे लेकिन उनके दस्तावेज नहीं दे रहे, वहीं कोर्ट में अभिभाषक वारसी ने हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस के उस दावे को ही गलत ठहराया जिसमें उन्होंने इस जगह को मंदिर बताया था। उनका कहना था कि इसको लेकर दावे किए गए, प्राचीन किताबों की बात की गई, लेकिन उनकी सत्यता या कानूनी पुष्टि पेश नहीं की गई। बगैर सत्यता के उसे मान्य नहीं किया जा सकता है।

जैन समाज को भी सुना जाए, वहीं शनिवार को एक बार फिर से जैन समाज की ओर से दायर याचिका जिसमें इस जगह पर दावा किया गया है उसकी ओर से भी वकील पेश हुए। उन्होंने अपनी याचिका पर सरकार द्वारा जवाब पेश नहीं किए जाने की शिकायत की। इसके बाद जब सरकार ने जवाब पेश करने की कोर्ट में जानकारी दी तो उन्होंने अपनी याचिका को भी मुख्य याचिकाओं के साथ सुनने की अपील कोर्ट से की। कोर्ट ने उन्हें भरोसा दिलाया कि सभी पक्षों को सुना जाएगा।