
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर : उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने पुलिस सेवा से जुड़े कर्मियों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करते हुए एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मप्र पुलिस रेगुलेशन के तहत दी गई ‘सेवामुक्ति’ की सजा भविष्य के शासकीय रोजगार के लिए अयोग्यता नहीं मानी जा सकती।
यह फैसला प्रदेश के उन आरक्षकों के लिए बड़ी कानूनी राहत है, जो सेवा में रहते हुए सब-इंस्पेक्टर या अन्य उच्च पदों की तैयारी कर रहे हैं। कोर्ट ने ‘बर्खास्तगी’ और ‘सेवामुक्ति’ का अंतर स्पष्ट करते हुए फैसला सुनाया। टिप्पणी की कि बर्खास्तगी भविष्य के सरकारी नियोजन का रास्ता बंद करती है, जबकि सेवामुक्ति में नए चयन में भाग लेने का अधिकार सुरक्षित रहता है। विभाग अक्सर दोनों को एक समान मानकर उम्मीदवारों का चयन रोक देता था।
चंद्रशेखर मौर्य ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। मौर्य वर्ष 2016 में विशेष सशस्त्र बल (एसएएफ) की 32वीं बटालियन, उज्जैन में आरक्षक पद पर नियुक्त हुए थे। बीमारी तथा सब-इंस्पेक्टर (उप-निरीक्षक) चयन परीक्षा की तैयारी के कारण कर्तव्य से अनाधिकृत रूप से अनुपस्थित रहने पर विभागीय जांच के बाद 19 जून 2020 को उन्हें सेवामुक्ति का दंड दिया गया था।
बाद में याचिकाकर्ता ने मप्र पुलिस विभाग द्वारा वर्ष 2020-21 में आयोजित आरक्षक भर्ती प्रक्रिया में भाग लिया और योग्यता के बल पर पुनः चयनित हुए। परंतु चरित्र सत्यापन के बाद सक्षम प्राधिकारी ने 26 जुलाई 2023 को पिछले सेवामुक्ति आदेश के आधार पर उन्हें पुलिस सेवा के लिए अनफिट (अयोग्य) करार दे दिया।
न्यायालय ने पाया कि चयन निरस्त करने वाले अधिकारी ने रेगुलेशन 214(v) के स्पष्ट प्रावधानों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। न्यायालय ने कहा कि यद्यपि पुलिस एक अनुशासित बल है, परंतु प्रशासनिक अधिकारी सेवा नियमों से परे जाकर किसी अभ्यर्थी पर ऐसा स्थायी प्रतिबंध नहीं लगा सकते, जिसकी अनुमति नियम पुस्तिका नहीं देती।
यह भी पढ़ें- 2013 की पुलिस भर्ती की 2015 मेरिट सूची का विवादित हिस्सा रद, हाई कोर्ट ने कहा-12 सप्ताह में संशोधित मेरिट सूची बनाएं