
शशिकांत तिवारी, नईदुनिया, भोपाल। मध्य प्रदेश में चाइनीज मांझा लोगों की जान ले रहा है, लेकिन सरकारी तंत्र का हाल देखिए कि रोकने के आदेश-निर्देश हवा में हैं। ठोस कार्रवाई नहीं होने का ही परिणाम है कि हर साल मकर संक्रांति के समय कई लोगों की गर्दन कट जा रही है। घटना होने के बाद पुलिस जागती है, फिर आदेश जारी होते हैं। कार्रवाई का दिखावा होता है। इसके बाद चुप्पी हो जाती है।
नायलान मांझे के संबंध में सबसे पहले सितंबर 2016 में नगरीय विकास एवं पर्यावरण विभाग ने सभी कलेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों को आदेश जारी किया था। इसमें पर्यावरण संरक्षण अधिनियम के उल्लंघन का हवाला दिया गया था। इसके बाद एनजीटी की राष्ट्रीय बेंच ने जुलाई 2017 में प्रतिबंध के आदेश दिए। फरवरी 2024 में पर्यावरण विभाग की तरफ से प्रतिबंध की राजपत्र में अधिसूचना भी प्रकाशित की गई। पुलिस मुख्यालय ने निर्देश जारी किए। उसके बाद भी यह सभी आदेश-निर्देश हवा में ही रहे। जानलेवा मांझे के निर्माण से लेकर उपयोग तक में शामिल लोगों के विरुद्ध कार्रवाई के लिए जिम्मेदार विभाग और अधिकारियों का दायित्व भी निर्धारित है, पर सच्चाई यह है कि पुलिस को छोड बाकी विभाग सुस्त पड़े हैं। वन विभाग और स्थानीय निकायों के अधिकारियों को जैसे कुछ पता ही नहीं है कि शासन ने उन्हें भी जिम्मेदारी दी है।
मध्य प्रदेश राज्य में लोकव्यापी रूप में ज्ञात चीनी मांझा सहित नायलान, प्लास्टिक या किसी अन्य सिंथेटिक पदार्थ से बने पतंग उड़ाने वाले धागे एवं अन्य धागे जो जो सिंथेटिक पदार्थ से लेपित हैं और गैर-जैवअवक्रमणीय (अपने आप नष्ट नहीं होने वाला) है, के निर्माण, बिक्री, भंडारण, खरीद, आपूर्ति, आयात और उपयोग पर पूर्ण प्रतिबंध होगा। केवल ऐसे सूती धागे से पतंग उड़ाने की अनुमति होगी, जो किसी भी तेज या धात्विक कांच के घटकों, चिपकने वाले पदार्थ या धागे को मजबूत करने वाली सामग्रियों से युक्त न हो।
इस तरह के मांझे के निर्माण और बिक्री पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 की धारा पांच के निर्देशों का उल्लंघन है, जिसमें अधिनियम की धारा 15 के अंतर्गत पांच वर्ष का कारावास और एक लाख रुपये तक अर्थदंड हो सकता है।
एए मिश्रा, सदस्य सचिव, मप्र प्रदूषण नियंत्रण मंडल ने कहा कि हमारी जिम्मेदारी मैन्यूफैक्चिरिंग रोकने की है। प्रदेश में कहीं ऐसा धागा बन नहीं रहा है। यह बाहर से आता है। बिक्री और उपयोग रोकने का काम दूसरे विभागों का है।