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मंदिर के असली स्वामी भगवान, कलेक्टर सिर्फ प्रबंधक : हाई कोर्ट, उज्जैन के रामोला मंदिर के 72 साल पुराने प्रकरण का निराकरण

उज्जैन जिले के खाचरौद स्थित रामोला मंदिर के प्रबंधन और पुजारी के अधिकार को लेकर 72 साल से लंबित अपील का मंगलवार को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने निराकरण कर...और पढ़ें

By Kuldeep BhawsarEdited By: Ramnath Mutkule
Publish Date: Tue, 25 Aug 2026 08:45:17 PM (IST)Updated Date: Tue, 25 Aug 2026 08:45:17 PM (IST)
मंदिर के असली स्वामी भगवान, कलेक्टर सिर्फ प्रबंधक : हाई कोर्ट, उज्जैन के रामोला मंदिर के 72 साल पुराने प्रकरण का निराकरण
खाचरौद स्थित रामोला मंदिर। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. हाई कोर्ट ने जिला कोर्ट का फैसला पलटा, शासन के पास रहेगा प्रबंधन
  2. शादीशुदा होने के आधार पर पुजारी रतनदास को हटाने का तर्क निरस्त
  3. 72 साल से लंबित अपील का मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने निराकरण किया

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर : उज्जैन जिले के खाचरौद स्थित रामोला मंदिर के प्रबंधन और पुजारी के अधिकार को लेकर 72 साल से लंबित अपील का मंगलवार को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने निराकरण कर दिया।

इंदौर खंडपीठ के न्यायमूर्ति विनय सराफ ने 62 पेज के फैसले में उज्जैन जिला कोर्ट का फैसला निरस्त करते हुए स्पष्ट किया कि रामोला मंदिर और उससे जुड़ी सभी चल-अचल संपत्तियों के स्वामी देवता श्रीराम हैं। मंदिर का प्रबंधन राज्य के राजस्व विभाग के अधीन रहेगा। ऐसे में कलेक्टर सिर्फ प्रबंधक हैं। किसी निजी समाज या संस्था को पुजारी नियुक्त करने या हटाने का अधिकार नहीं है।

1907 की वसीयत से शुरू हुआ विवाद

मंदिर के प्रबंधन को लेकर विवाद की शुरुआत 19 दिसंबर 1907 की महंत गोपालदास की वसीयत से हुई। इसमें माहेश्वरी समाज के पंचों की प्रबंधन में भूमिका का उल्लेख था। रतनदास पक्ष ने इसका विरोध किया। विवाद बढ़ने पर रतनदास के पिता महंत मुरलीदास ने मंदिर को राज्य के संरक्षण में देने का अनुरोध किया। 15 अक्टूबर 1930 को औकाफ विभाग (अब धार्मिक न्यास और धर्मस्व विभाग) ने मंदिर और उससे जुड़ी संपत्तियों का प्रबंधन अपने अधीन ले लिया।


मुरलीदास की मृत्यु के बाद रामानंद संप्रदाय के साधुओं ने भेख समारोह में रतनदास को उत्तराधिकारी महंत चुना। औकाफ विभाग ने 1948 में उन्हें पुजारी नियुक्त कर मंदिर का प्रभार सौंपा। माहेश्वरी समाज ने उनकी नियुक्ति और विवाह के बाद पुजारी बने रहने पर आपत्ति की। कोर्ट ने कहा कि रामोला मंदिर मठ नहीं है, इसलिए पुजारी के लिए निहंग यानी ब्रह्मचारी होना अनिवार्य नहीं है।

1954 में मुकदमा, 1993 में हाई कोर्ट ने दिया था फैसला

रतनदास ने 1954 में मंदिर और संपत्तियों के प्रबंधन का अधिकार मांगते हुए मुकदमा दायर किया था। 1968 में विचारण न्यायालय ने दावा खारिज कर दिया। हाई कोर्ट ने 1993 में रतनदास के पक्ष में फैसला दिया, जिसे माहेश्वरी समाज ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने 2020 में फैसला निरस्त कर मामला नए सिरे से सुनवाई के लिए भेज दिया। दोबारा सुनवाई में हाई कोर्ट ने रतनदास की पुजारी की नियुक्ति वैध मानी, लेकिन मंदिर की संपत्ति पर उनका या किसी समाज का मालिकाना अधिकार नहीं माना। मंदिर की संपत्ति देवता श्रीराम की और प्रबंधन शासन के पास रहेगा। माहेश्वरी समाज को श्रद्धालु मानते हुए उसे दर्शन-पूजा से रोकने की मांग भी खारिज कर दी।

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