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उदय प्रताप सिंह, नईदुनिया, इंदौर। शहर के भागीरथपुरा में दूषित जल के कारण अब तक 24 लोगों की मृत्यु हो चुकी है। मामले में एमजीएम मेडिकल कॉलेज द्वारा की गई जांच में दो मरीजों में कालरा की पुष्टि हुई थी। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आईसीएमआर) ने भोपाल में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन को जो रिपोर्ट प्रस्तुत की, उसमें मेडिकल कॉलेज की रिपोर्ट को सही ठहराया गया है।
आईसीएमआर के निर्देश पर हाल ही में एम्स, भोपाल और कोलकाता के नेशनल इंस्टीट्यूट आफ बैक्टीरियोलॉजी के विशेषज्ञों ने भागीरथपुरा के मरीजों के सैंपल लेकर जांच की। इसमें जिस मरीज में कालरा पाया गया था, आइसीएमआर की टीम ने उसके सैंपल की भी पुष्टि की है। आईसीएमआर ने कहा है कि जब तक भागीरथपुरा में अंतिम मरीज में कालरा के लक्षण नहीं मिलते, तब तक उस क्षेत्र में जांच जारी रखी जाएगी। इसके बाद ही क्षेत्र को महामारी मुक्त घोषित किया जाएगा।
आईसीएमआर ने भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई मौतों के बाद नगरीय निकाय और राज्य सरकार को कुछ निर्देश भी जारी किए हैं। इसमें सुझाव दिया गया है कि जिस तरह इंदौर में प्रदूषण के स्तर को बताने के लिए वायु गुणवत्ता सूचकांक चौराहों पर प्रदर्शित किए जाते हैं, उसी तर्ज पर नगर निगम को शहर के विभिन्न इलाकों में पानी की गुणवत्ता भी सार्वजनिक स्थानों पर प्रदर्शित करनी चाहिए। कोलकाता के नेशनल इंस्टीट्यूट आफ बैक्टीरियोलाजी के विशेषज्ञ भागीरथपुरा के मरीजों के सैंपल लेकर वहां बैक्टीरिया की जेनेटिक मैपिंग कर रहे हैं।
इससे यह पता लगाया जाएगा कि बैक्टीरिया में क्या बदलाव आए हैं, जिससे लोगों की मृत्यु हुई। आइसीएमआर ने मेडिकल कालेज को रैपिड डायग्नोस किट भी प्रदान की है। मरीजों के स्टूल टेस्ट की लैब में जांच की रिपोर्ट 48 घंटे में मिलती है। इस किट से जांच करने पर रिपोर्ट जल्दी प्राप्त होती है।
नर्मदा पेयजल में क्लोरीन की मात्रा 0.2 मिलीग्राम प्रति लीटर से अधिक होनी चाहिए।
पानी की टंकी से जल वितरण के दौरान जल वितरण पाइपलाइन के अंतिम छोर पर भी पानी की गुणवत्ता की जांच की जाए।
पेयजल में फिकल कंटीमेशन और ई-कोलाई बैक्टीरिया की जांच की जाए।
भागीरथपुरा क्षेत्र में हर दो से तीन माह में पानी की जांच की जाए।
चौराहों पर डैशबोर्ड में पानी की गुणवत्ता प्रदर्शित की जाए।