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Indore History: जानिए क्या दर्शाती हैं होलकर राज्य के चिह्न में शामिल एक-एक चीज, सिर ढंके बिना नहीं गा सकते थे राज्यगीत

होलकर राजवंश के चिह्न में गहरा अर्थ छिपा है। ‘प्राहोमेशो लभ्या श्री कर्तु: प्रारब्धात्’ घोष वचन का मतलब यत्न से यश और ऐश्वर्य मिलता है।

By Harshal RathoreEdited By: Prashant Pandey
Publish Date: Sat, 13 Jun 2026 10:37:32 AM (IST)Updated Date: Sat, 13 Jun 2026 10:42:37 AM (IST)
Indore History: जानिए क्या दर्शाती हैं होलकर राज्य के चिह्न में शामिल एक-एक चीज, सिर ढंके बिना नहीं गा सकते थे राज्यगीत

HighLights

  1. होलकर राजवंश सूर्यवंशी राजघराने का प्रतीक है
  2. मालव भूमि पर अश्व यह वीरों का वाहन है
  3. सूर्य और अश्व यह क्षत्रिय वंशजों का स्फूट चिह्न है

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। भारत के इतिहास को जब हम करीब से जानने की कोशिश करते हैं तो पाते हैं कि यहां हर राज्य का अपना ध्वज, चिह्न, गीत, प्रमुख हथियार यहां तक कि विशेष संबोधन भी रहा। इनके निर्माण की सोच केवल एक राजा तक ही सीमित नहीं रही बल्कि सदियों तक प्रभावी रही।

इतिहास अध्येता सुनील गणेश मतकर के अनुसार इंदौर की बात करें तो होलकर राजवंश भी इसका उदाहरण प्रस्तुत करता है। ‘प्राहोमेशो लभ्या श्री कर्तु: प्रारब्धात्’ यह होलकर राज्यकर्ताओं का घोष वचन है जिसमें ‘होलकर’ शब्द का बखूबी समावेश है।

इसका अर्थ है उमेश अर्थात भगवान शिवजी माता पार्वतीजी से कहते हैं: जो यत्न करते हैं, उन्हें यश प्राप्ति होती है। यश प्राप्ति के साथ ईश्वर उसे ऐश्वर्य भी प्रदान करते हैं। होलकर राजवंश के राज्य चिह्न में छतरी, सूर्य, नंदी, अश्व, भाला, खांडा, (तलवार), गेहूं व अफीम के पौधे दिखाई देते हैं।


मालवा में गेहूं और अफीम की पैदावार को महत्व दिया गया

छतरी का अर्थ है सूबेदार मल्हारराव होलकर पर नाग की छायारूपी छत्र की किंवदंती से जुड़ा हुआ है। होलकर राजवंश सूर्यवंशी राजघराने का प्रतीक है इसलिए इसमें सूर्य प्रकाशमान है। मालव भूमि पर अश्व यह वीरों का वाहन है। सूर्य और अश्व यह क्षत्रिय वंशजों का स्फूट चिह्न है। भाला व खांडा यह दो शस्त्र हैं। मालवा में होलकरों ने गेहूं और अफीम की पैदावार को सदैव महत्व दिया इसलिए इन पौधों को दर्शाया गया है।

‘प्रभो प्रार्थना परीसा आमुची द्या सुख पाळुनी राजाला। देवा, आमुच्या महाराजांच्या राखी विजयी भल्याला। आणि करोनी राज्य सदोदित देवो सुख तो देशाला।’ यह होलकर शासनकाल का राज्यगीत है। इस गीत की रचना अक्टूबर 1863 में कवि विष्णु सोमनाथ सरवटे ने की थी, जो तुकोजीराव होलकर (द्वितीय) के शिक्षक भी थे। यह राज्य गीत संपूर्ण होलकर राज्य में सार्वजनिक व राज्य के कार्यक्रमों के पश्चात वर्ष 1872 से लेकर 25 जून 1948 तक गाया जाता रहा।

पूरा गीत आठ चरणों का है

इस गीत की सिर्फ प्रथम चार पंक्तियां ही समूह स्वरों में गाई जाती थीं। यद्यपि संपूर्ण गीत आठ चरणों का है। मराठी भाषा के इस गीत को राज्य की सभी प्रजा अनिवार्य रूप से गाकर राज्य और राजा के प्रति सम्मान देती थी। नियम यह था कि यह गीत खुले सिर से नहीं गाया जाता था। गीत गाते समय पुरुषों को टोपी, रुमाल, साफा, पगड़ी व महिलाओं को सिर पर पल्लू रखना होता था।

वर्ष 1955 तक शहर के प्रजाजन को राजवाड़ा के सम्मुख गुजरते समय सिर ढंका होना आवश्यक था। यह राजा व राजवाड़ा के प्रति सम्मान व्यक्त करने की भावना थी। इस अलिखित नियम के उल्लंघन पर दो कोड़े मारने की सजा भी दी जाती थी।

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