
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर : उज्जैन जिले के खाचरौद स्थित रामोला मंदिर को लेकर लगभग छह दशक से चल रहे विवाद में सुनाए गए मप्र हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने भी मुहर लगा दी। इस संबंध में प्रस्तुत अपील को पहली ही सुनवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाई कोर्ट के फैसले में किसी तरह के संशोधन की गुंजाइश नहीं है। हाई कोर्ट ने फैसले में कहा था कि रामोला मंदिर (श्रीराम मंदिर) और उससे संबंधित सभी चल-अचल संपत्ति के एकमात्र और वास्तविक स्वामी स्वयं भगवान श्रीराम हैं।
शासन सिर्फ प्रबंधक की भूमिका में है। कोर्ट ने यह व्यवस्था भी दी थी कि इस देवस्थान का पूर्ण नियंत्रण और प्रबंधन प्रदेश शासन के राजस्व विभाग के पास रहेगा। माहेश्वरी समाज या किसी अन्य निजी संस्था को मंदिर के पुजारी की नियुक्त करने या उसे पद से हटाने का कोई वैधानिक अधिकार नहीं है।
खाचरौद स्थित रामोला मंदिर (श्रीराम मंदिर) के प्रबंधन और पुजारी के अधिकारों को लेकर पिछले 72 वर्षों से कानूनी विवाद चल रहा था। न्यायमूर्ति विनय सराफ ने 25 अगस्त 2026 को मामले में फैसला सुनाते हुए कहा था कि मंदिर की संपत्ति निजी जागीर नहीं कि इसे वसीयत या समझौते के आधार पर किसी समाज को सौंप दिया जाए। इस फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में अपील प्रस्तुत हुई थी।
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला एवं न्यायमूर्ति के विनोद चंद्रन की पीठ ने पहली ही सुनवाई पर यह कहते हुए अपील निरस्त कर दी कि हस्तक्षेप का कोई उचित आधार नहीं है।
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