
डिजिटल डेस्क। मध्य प्रदेश की लगभग सात लाख आदिवासी महिलाओं के लिए सरकारी नियम वरदान की जगह एक बड़ी उलझन बन गए हैं। प्रदेश की सबसे पिछड़ी और अति संवेदनशील जनजातियों (बैगा, भारिया और सहरिया) की ये महिलाएं प्रशासनिक लालफीताशाही के चलते अपने हकों से वंचित हो रही हैं।
उन्हें एक योजना का लाभ मिलने की भारी कीमत दूसरी बड़ी योजना से बाहर होकर चुकानी पड़ रही है। इस अजीबोगरीब विसंगति के खिलाफ अब मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर कर न्याय की गुहार लगाई गई है।
दरअसल, राज्य सरकार की दो बड़ी योजनाएं 'मुख्यमंत्री लाड़ली बहना 2023' और 'खाद्य/पोषण अनुदान योजना' कानूनी पेंच में फंस गई हैं। पूर्व विधायक और सामाजिक कार्यकर्ता पारस सकलेचा ने अपने अधिवक्ता मनीष यादव के जरिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। उन्होंने अदालत से मांग की है कि इन सात लाख पात्र आदिवासी महिलाओं को भी लाड़ली बहना योजना में शामिल किया जाए, जिन्हें तकनीकी कारणों का हवाला देकर बाहर कर दिया गया है।
यह मामला सिर्फ कागजी नहीं है, बल्कि सरकार खुद इस बात को स्वीकार कर चुकी है। 2 दिसंबर 2025 को विधानसभा में महिला एवं बाल विकास मंत्री ने लिखित रूप में यह माना था कि क्लॉज 4.4 के नियमों के तहत ही इन आदिवासी महिलाओं को अपात्र माना गया है, क्योंकि वे पहले से पोषण आहार योजना के 1500 रुपये ले रही हैं। अब देखना यह होगा कि हाई कोर्ट इस मामले में क्या फैसला सुनाता है और क्या इन गरीब आदिवासी महिलाओं को योजना का लाभ मिल पाता है।
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