
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। मप्र हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने आपसी सहमति से तलाक के एक मामले में कुटुंब न्यायालय के आदेश को निरस्त करते हुए कहा कि आपसी सहमति से तलाक में हर मामले में छह माह की प्रतीक्षा अवधि (कूलिंग पीरियड) पूरा करना अनिवार्य नहीं है। अगर पति-पत्नी लंबे समय से अलग रह रहे हैं और उनमें सुलह की संभावना खत्म हो गई है तो ऐसी स्थिति में कोर्ट प्रतीक्षा अवधि समाप्त करने पर विचार कर सकती है। कोर्ट ने कुटुंब न्यायालय से कहा है कि वह याचिका पर 15 दिन में नए सिरे से फैसला ले।
आपसी विवाद के चलते पति-पत्नी अप्रैल 2025 से अलग-अलग रह रहे हैं। उन्होंने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी के तहत आपसी सहमति से तलाक के लिए कुटुंब न्यायालय में आवेदन दिया था। पति की ओर से इस आवेदन के साथ ही एक अन्य आवेदन भी प्रस्तुत हुआ। इसमें कहा कि चूंकि पति-पत्नी के बीच सुलह की कोई संभावना नहीं है इसलिए छह माह की प्रतीक्षा अवधि (कूलिंग पीरियड) को खत्म करते हुए आपसी सहमति से प्रस्तुत तलाक के आवेदन को तुरंत स्वीकार किया जाए, लेकिन कुटुंब न्यायालय ने कूलिंग पीरियड खत्म करने से इंकार करते हुए आवेदन निरस्त कर दिया।
कुटुंब न्यायालय ने प्रकरण की अगली सुनवाई 4 अप्रैल 2027 को नियत की थी। कुटुंब न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए पति ने हाई कोर्ट में याचिका प्रस्तुत की। न्यायमूर्ति संदीप एन भट्ट ने याचिका स्वीकारते हुए कुटुंब न्यायालय को आदेश दिया है कि वह 15 दिन में आवेदन पर नए सिरे से फैसला ले।
न्यायविदों का कहना है कि हाई कोर्ट ने कूलिंग पीरियड की अवधि समाप्त नहीं की है बल्कि इस बारे में प्रस्तुत आवेदन पर कुटुंब न्यायालय से नए सिरे से निर्णय लेने के लिए कहा है। कुटुंब न्यायालय को नए सिरे से सुनवाई कर तय करना है कि कूलिंग पीरियड की छह माह की अवधि समाप्त की जाए या नहीं।
आपसी सहमति से तलाक के लिए प्रस्तुत होने वाले आवेदन में कोर्ट सामान्यत: छह माह का कूलिंग पीरियड रखता है ताकि पति-पत्नी को जल्दबाजी में तलाक लेने से रोका जा सके। कोर्ट सुलह के प्रयासों के लिए समय देने के उद्देश्य से ऐसा करता है।
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