
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। बीआरटीएस कौन हटाएगा और कब तक हटेगा यह अब भी स्पष्ट नहीं है। अधिकारी कह रहे हैं कि एलिवेटेड कारिडोर बनना है इसलिए बीआरटीएस को पूरी तरह से नहीं हटा सकते, लेकिन उन्हें भी नहीं पता कि कारिडोर तब तक तैयार होगा और तब तक शहर के बदहाल यातायात का जिम्मेदार कौन होगा। बीआरटीएस हटाने और एलिवेटेड कारिडोर में हो रही लेटलतीफी को लेकर नाराजगी जताते हुए कोर्ट ने यह तक कह दिया कि न एलिवेटेड कारिडोर बनेगा न बीआरटीएस बनेगा, जनता यूं ही परेशान होती रहेगी।
सुनवाई एक घंटे से ज्यादा समय तक चली। इस दौरान कोर्ट ने बार-बार यह कहा कि यह जनहित याचिका है और हमारे लिए जनता का हित सबसे ऊपर है। हम उसे यूं ही परेशान नहीं होने दे सकते। कोर्ट ने मुख्य सचिव से कहा कि वे पीडब्ल्यूडी और नगरीय विकास विभाग के प्रमुख सचिवों से समन्वय कर एलिवेटेड कारिडोर निर्माण और बीआरटीएस हटाने के संबंध में निर्णय लें, ताकि जनता को राहत मिल सके। कोर्ट ने निगमायुक्त से भी कहा कि वे बीआरटीएस हटाने का ठेका लेने वाले ठेकेदार से चर्चा करें और देखें कि बीआरटीएस हटाने का काम कैसे आगे बढ़ सकता है। कोर्ट इस मामले में 28 जनवरी को फिर सुनवाई करेगी।
बीआरटीएस हटाने और शहर की बदहाल यातायात व्यवस्था को लेकर चार अलग-अलग जनहित याचिकाएं हाई कोर्ट में चल रही हैं। सोमवार को भोजनावकाश के तुरंत बाद इन याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई शुरू हुई। कोर्ट के आदेश पर कलेक्टर शिवम वर्मा, निगमायुक्त क्षितिज सिंघल, पीडब्ल्यूडी के इंजीनियर व्यक्तिगत रूप से उपस्थित हुए। सुनवाई के दौरान पीडब्ल्यूडी के इंजीनियर बार-बार कोर्ट को यह बताने का प्रयास करते रहे कि एलिवेटेड कारिडोर का काम अगले माह से शुरू हो जाएगा, जब तक यह काम पूरा नहीं हो जाता तब तक बीआरटीएस को पूरी तरह से नहीं हटाया जा सकता। इस पर कोर्ट ने नाराजगी जताई और कहा कि हम भी जानते हैं कि कारिडोर बनने में कितना समय लगेगा।
हाई कोर्ट में कुछ यूं चली सुनवाई...
कोर्ट: एलिवेटेड कारिडोर की योजना कब बनी थी। कब तय हुआ था कि कारिडोर बनाया जाना है? अधिकारी: माय लार्ड 2022 में योजना बनी थी। कोर्ट: चार साल हो गए, अब तक कुछ नहीं हुआ। अधिकारी: अगले माह काम शुरू कर देंगे। एडवोकेट बागडिया: मायलाड 2022 नहीं 2019 में योजना बनी थी। एलिवेटेड कारिडोर की योजना और मिट्टी परीक्षण पर पांच करोड़ रुपये खर्च किए गए थे, लेकिन फिर सरकार बदली और नई सरकार ने इस योजना को बंद कर दिया। वर्ष 2024 में फिर नए मुख्यमंत्री ने इसका भूमिपूजन कर दिया। जनता को लगने लगा कि अब एलिवेटेड कारिडर का काम शुरू होगा, लेकिन कुछ नहीं हुआ। दरअसल इस कारिडोर को बनाने में किसी की रूचि नहीं है।
कोर्ट: बीआरटीएस हटाने के काम का क्या हुआ? निगमायुक्त: सर ठेकेदार मौजूद है। वह काम नहीं कर रहा। कोर्ट (ठेकेदार से): आपको काम करने में क्या दिक्कत है? ठेकेदार: सर मैं नहीं कर सकता। मेरी हालत नहीं है काम करने की। कोर्ट: आपको ठेका लेने से पहले सोचना चाहिए था। आप जनता को इस तरह से परेशान नहीं कर सकते। निगमायुक्त: सर एलिवेटेड कारिडोर 6 किमी में बनना है। जबकि बीआरटीएस 11.2 किमी है। कलेक्टर: सर जहां काम शुरू करना है सिर्फ वहां बीआरटीएस होल्ड कर शेष जगह हटा सकते हैं। अजय बागडिया: सर समझ नहीं आता हर प्रयोग इंदौर में क्यों किया जा रहा है। अधिकारियों ने शहर को गिनी पिग बनाकर रख दिया है।
सुनवाई के दौरान भागीरथपुरा दूषित पानी कांड का भी उल्लेख हुआ। कोर्ट ने कहा कि सभी को पता है कि देश का सबसे स्वच्छ शहर पहले ही भागीरथपुरा हादसे की वजह से बदनाम हो चुका है। हम नहीं चाहते कि बीआरटीएस और एलिवेटेड कारिडोर को लेकर फिर इसकी बदनामी हो। हम यहां जनता के हित की बात कर रहे हैं। जनता को असुविधा नहीं होना चाहिए।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने निगमायुक्त क्षितिज सिंघल से पूछा कि अब तक बीआरटीएस क्यों नहीं हटा। निगमायुक्त ने कहा कि ठेकेदार काम ही नहीं कर रहा है। हमने सारे प्रयास कर लिए हैं। कोर्ट ने ठेकेदार दिनेश यादव से कहा कि आपको काम करने में क्या परेशानी है। ठेकेदार ने बताया कि मैं काम नहीं कर सकता। मेरी स्थिति ऐसी नहीं है कि काम कर सकूं। इस पर कोर्ट ने कहा कि ऐसा नहीं होता है। यह बात आपको ठेका लेने से पहले सोचना थी। कोर्ट ने निगमायुक्त से ठेकेदार पर भारी जुर्माना लगाने के लिए कहा तो ठेकेदार बोला मैं निगमायुक्त से चर्चा कर अपनी बात रखना चाहता हूं।
सुनवाई के दौरान बीआरटीएस निर्माण के दौरान हुई गड़बड़ियां भी सामने आईं। ठेकेदार ने कोर्ट को बताया कि जितना माल बताया गया था उतना नहीं मिल रहा है। इस वजह से वह काम नहीं कर पा रहा है। 12 टन स्क्रैप निकलना था लेकिन सिर्फ आठ टन निकल रहा है। मैं अपनी जेब से पैसे लगा चुका हूं, लेकिन अब आगे काम नहीं कर पाऊंगा।
सुनवाई के दौरान जब अधिकारी बार-बार कोर्ट से कहने लगे कि आदेश दे दें, हम काम शुरू करवा देंगे तो वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बागडिया ने कहा कि पुराने आदेशों का पालन ही नहीं हो रहा है। 2019 में एक जनहित याचिका की सुनवाई करते हुए कोर्ट ने आदेश दिया था कि व्यस्त समय में शहर के प्रमुख चौराहों पर अनिवार्य रूप से पुलिसकर्मी तैनात रहेंगे, लेकिन छह साल बाद भी आदेश का पालन नहीं हुआ।
सुनवाई के दौरान निगमायुक्त ने कोर्ट को बताया कि बीआरटीएस के 3.1 किमी हिस्से में रैलिंग हट चुकी है। डिवाइडर बनाने के लिए एजेंसी भी तय हो चुकी है। इस पर कोर्ट ने निगम से कहा कि वह इस हिस्से में डिवाइडर बनाने का काम शुरू कर दे। कोर्ट ने यह भी कहा कि बीआरटीएस को शासन ने बनाया था और शासन ने ही तोड़ने का निर्णय लिया है। दिल्ली में कोई बीआरटीएस नहीं है, बावजूद इसके वहां आपातकाल में वाहन निकलते हैं। देखना चाहिए कि कैसे यातायात व्यवस्था को दुरुस्त किया जा सकता है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बागडिया, एडवोकेट मनीष यादव, शासन की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता राहुल सेठी, कोर्ट द्वारा गठित समिति की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता गिरीष पटवर्धन ने पैरवी की।