
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। शहर के बदहाल ट्रैफिक को लेकर हाई कोर्ट ने एक बार फिर नाराजगी जताई है। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ सिस्टम को ही नहीं दिख रहा कि क्या हाल हो गया है, बाकी हर व्यक्ति जान रहा है। चौराहों पर पुलिसकर्मी नजर नहीं आते, पता नहीं आखिर वे रहते कहां हैं। ट्रैफिक के नियमों का खुलेआम उलंघन होता है, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होती।
पुलिस कह रही है कि कार्रवाई करते हैं, लेकिन पता नहीं वे किस दुनिया में रहते हैं। शासन ने पालन प्रतिवेदन तो प्रस्तुत कर दिया लेकिन इसमें कई बिंदुओं पर जानकारी ही नहीं है। अकेले इंदौर में हजारों ट्रैफिक चालान पेंडिंग हैं। करोड़ों रुपये लेना बाकी हैं, लेकिन कार्रवाई नहीं हो रही ऐसा इसलिए क्योंकि अधिकारी लापरवाह हैं। हमने सभी पक्षों को सुन लिया है। हम इस बारे में आदेश जारी करेंगे।
मप्र हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने यह तल्ख टिप्पणी शहर के बदहाल ट्रैफिक को लेकर चल रही पांच जनहित याचिकाओं की सुनवाई करते हुए मंगलवार को की। सुनवाई करीब एक घंटे तक चली। इस दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता अजय बागडिया ने कोर्ट को बताया कि आदेश के बावजूद सभी ट्रैफिक सिग्नल अब भी चालू नहीं हैं। स्मार्ट सिटी के पास 58 सिग्नल हैं। इनमें से सिर्फ 26 आइटीएमएस से जुड़े हैं। शहर के 40 इंट्री पाइंट पर 170 पुलिसकर्मी तैनात हैं। इन्हें यहां से हटाकर यातायात व्यवस्था सुधारने में लगाया जा सकता है।
एडवोकेट बागडिया ने कोर्ट को बताया कि नगर निगम नागरिकों को पार्किंग तक उपलब्ध नहीं करवा पा रहा है। शहर में सिर्फ 26 पार्किंग हैं। जबकि कानपुर में 42, लखनऊ में 62 और नागपुर में 51 पार्किंग हैं। पार्किंग की व्यवस्था नहीं होने से नागरिक फुटपाथ पर वाहन पार्क करते हैं। 6 लेन सड़क की दो लेन सिर्फ वाहनों की पार्किंग से भरा जाती है। मल्टीलेवल पार्किंग बनाए हैं लेकिन वहां अंधेरा रहता है।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पुलिसकर्मियों के रिक्त पदों पर अब तक नियुक्ति नहीं होने पर नाराजगी जताई। अतिरिक्त महाधिवक्ता राहुल सेठी ने कोर्ट को बताया कि इस संबंध में शासन को पत्र लिखा जा चुका है। इस पर कोर्ट ने कहा कि यह स्थिति ठीक नहीं है। शासन को इस बारे में गंभीरता से विचार करना होगा। शासन के प्रतिवेदन में यह भी स्पष्ट नहीं है कि इस बारे में क्या कदम उठाए जा रहे हैं।
दूसरी ओर, शासन की ओर से कोर्ट को बताया गया कि शहर में लेफ्ट टर्न चौडीकरण का काम तेजी से चल रहा है। सरकारी वकील ने जिन चौराहों पर काम हो चुका है उनकी सूची भी पेश की। साथ ही यह भी बताया कि किन चौराहों के चौड़ीकरण का काम चल रहा है।
सुनवाई के दौरान अधिवक्ताओं ने यह सवाल भी उठाया कि नियमों के पालन की बाध्यता सिर्फ निजी वाहनों के लिए है। एक अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि शिवाजी वाटिका के पास उल्टी दिशा में सरकारी बसें आती हैं, पुलिस भी तैनात रहती है लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होती। इसके अलावा, पिछली सुनवाई पर कोर्ट ने नगर निगम से कहा था कि वह ऐसी व्यवस्था करे कि लोग 311 एप्लीकेशन पर गड्ढों के फोटो और जानकारी अपलोड कर सकें।
मंगलवार को कोर्ट को बताया गया कि फोटो अपलोड तो होने लगे हैं, लेकिन जानकारी अपडेट नहीं हो रही। शासकीय अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि इस दिशा में काम चल रहा है। इस पर कोर्ट ने टिप्पणी की कि सिर्फ अधिवक्ता को पता है कि क्या काम चल रहा है। आमजन को कुछ नहीं पता। एप्लीकेशन पर जानकारी अपलोड क्यों नहीं हो रही।
याचिकाओं में से एक में पार्किंग शुल्क का मुद्दा उठाया गया है। मंगलवार को सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता ने कोर्ट से कहा कि नया वाहन खरीदते समय 1500 से तीन हजार रुपये पार्किंग शुल्क वसूला जाता है। इसके बावजूद पार्किंग नहीं मिलती। शहर में पार्किंग की व्यवस्था क्या है यह सभी को पता है। इस पर कोर्ट ने शासकीय अधिवक्ता से इस अंदाज में सवाल किए:
कोर्ट - मकान का नक्शा पास करते समय यह नहीं देखा जाता है क्या कि वाहन पार्किंग है या नहीं?
शासकीय अधिवक्ता - सर प्रविधान रहता है। जांच करते हैं।
कोर्ट - अगर रहता है तो फिर शत प्रतिशत निर्माण कैसे हो जाता है। लोग पूरा बना लेते हैं। आप क्या कार्रवाई करते हैं।
शासकीय अधिवक्ता - सर नोटिस देते हैं। कार्रवाई करते हुए अवैध निर्माण तोड़ा भी जाता है।
कोर्ट - हर भवन में पार्किंग व्यवस्था आवश्यक होती है फिर क्यों नहीं होती। हम भी देखते हैं कि कारें घर के बाहर खड़ी रहती हैं क्योंकि जगह ही नहीं रहती।
याचिकाकर्ता - सर सारे घरों में पार्किंग की जगह बैठक बनी हुई है।
शासकीय अधिवक्ता - सर हम निगरानी करते हैं, कार्रवाई भी करते हैं।
कोर्ट - ठीक है आप अगली तारीख पर बताएं कि आपने ऐसे कितने लोगों के खिलाफ कार्रवाई की जिनके यहां पार्किंग नहीं थी।
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