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नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। आदिवासी समुदाय के कुछ लोगों के विरुद्ध दर्ज एफआइआर का विरोध करने के उद्देश्य से हुए जय आदिवासी युवा शक्ति (जयस) के प्रदर्शन में शामिल छात्र के खिलाफ दर्ज एफआइआर हाई कोर्ट ने निरस्त कर दी।
कोर्ट ने कहा कि 12वीं की परीक्षा में पांच में से चार विषयों में विशेष योग्यता हासिल करने वाले छात्र को सिर्फ इसलिए आपराधिक कार्रवाई में घसीटना कि वह आदिवासी समुदाय के सदस्यों के खिलाफ दर्ज एफआइआर के विरोध में प्रदर्शन कर रहे दूसरे लोगों के साथ शामिल था, सही नहीं है। कोर्ट ने छात्र के खिलाफ दर्ज एफआइआर, जांच के बाद पेश चार्जशीट और संज्ञान लेने का आदेश निरस्त कर दिया।
मामला बड़वानी जिले के पलसूद का है। 30 जून 2024 को आदिवासी समुदाय के कुछ लोगों के खिलाफ एफआइआर दर्ज हुई थी। इसके विरोध में जयस के सदस्यों ने 6 जुलाई 2024 को पुलिस को आवेदन देकर एफआइआर निरस्त करने की मांग की थी।
पुलिस का कहना है कि जयस के सुमेर सिंह, सीमा, विक्रम, तुकाराम, कमल, अनिल और राजेश अचालिया सहित सात लोग बैनर लेकर थाने पहुंचे और नारेबाजी की। इन लोगों ने एसडीओ से जुलूस और प्रदर्शन की अनुमति नहीं ली थी। यह आरोप भी लगा कि प्रदर्शनकारियों के थाने में जमा होने से पुलिसकर्मियों के कामकाज में बाधा पहुंची। वे थाने से बाहर नहीं निकल सके।
विचारण कोर्ट ने 16 दिसंबर 2024 को सभी सात आरोपितों के विरुद्ध संज्ञान ले लिया। इसे चुनौती देते हुए राजेश अचालिया ने हाई कोर्ट में याचिका प्रस्तुत की। तर्क रखा कि जिला दंडाधिकारी ने मामले में कोई शिकायत नहीं की थी। पुलिस ने खुद एफआइआर दर्ज कर ली और उसी आधार पर कोर्ट ने संज्ञान ले लिया। शासन की ओर से कहा गया कि विचारण कोर्ट पहले ही आरोप तय करने के लिए पर्याप्त सामग्री होने की संतुष्टि कर चुका है।
कोर्ट ने दोनों पक्षों को सुनने के बाद कहा कि धारा 215 के तहत बीएनएस की धारा 206 से 223 तक के अपराधों में संबंधित लोक सेवक अथवा उसके प्रशासनिक वरिष्ठ अधिकारी की लिखित शिकायत के बगैर कोर्ट संज्ञान नहीं ले सकती। सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि एक ही घटना से जुड़े अपराधों को अलग-अलग बताकर कानूनी प्रक्रिया की अनिवार्यता को दरकिनार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने राजेश अचालिया की याचिका स्वीकार कर ली।
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