Tradition Of Indore: 100 साल से इंदौर में जारी है नारदीय कीर्तन परंपरा
Tradition Of Indore: एक वह दौर था जब गोपाल मंदिर में कथा सुनने होलकर राजवंश के सदस्य भी आते थे। ...और पढ़ें
By Sameer DeshpandeEdited By: Sameer Deshpande
Publish Date: Sat, 02 Jul 2022 01:58:01 PM (IST)Updated Date: Sat, 02 Jul 2022 01:58:01 PM (IST)

Tradition Of Indore: इंदौर, नईदुनिया प्रतिनिधि। वक्त के साथ इस शहर ने बहुत कुछ बदलते देखा और खुद को उसमें ढाला भी। कभी आधुनिकता का बोलबाला हुआ तो कभी विकास के पहिए ने बदलते दौर के साथ खुद को साधा। पर यहां की परंपराओं ने कभी अपना प्रभाव नहीं छोड़ा। हां, समय के साथ उसमें परिवर्तन अवश्य हुआ लेकिन आधुनिकता की चकाचौंध में इस शहर ने अपनी परंपराओं को कभी बिसराया नहीं और ऐसी ही एक परंपरा और कला करीब 100 वर्ष से शहर में निभाई जा रही है। यह परंपरा है नारदीय कीर्तन की, जिसे पीढ़ी दर पीढ़ी सुनाया जा रहा है।
शहर का ऐतिहासिक गोपाल मंदिर हो या उज्जैन का महाकालेश्वर मंदिर, दोनों ही स्थानों पर इस परंपरा का जीवंत स्वरूप पर्व विशेष पर दिख ही जाता है। महाकालेश्वर मंदिर में महाशिवरात्रि पर्व के नौ दिन और इंदौर के गोपाल मंदिर में महाराष्ट्रीयन श्रावण माह में आज भी नारदीय कीर्तन परंपरा के अनुरूप हरि-हर कथा सुनाई जाती है। यह परंपरा निभा रहे हैं कानड़कर परिवार के पं. श्रीराम कानड़कर।
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कानड़कर परिवार द्वारा नारदीय कीर्तन परंपरा का निर्वहन करने वाली नौवीं पीढ़ी के पं. श्रीराम बताते हैं कि उनके पूर्वज को महाराष्ट्र से ग्वालियर के सिंधिया शासक उज्जैन लेकर आए और सखाराम बुआ जोशी को आगर-मालवा के गांव कानड़ में बसाकर महाकालेश्वर मंदिर में कीर्तन करने को कहा। कानड़ गांव में बसने के कारण परिवार कानड़कर नाम से पहचाना जाने लगा और सखाराम बुआ कानड़कर ने 1909 से महाकाल मंदिर में कीर्तन करना शुरू किया। चंद वर्षों बाद चंद्रावतीदेवी होलकर ने इंदौर कीर्तन करने बुलाया और गोपाल मंदिर में महाराष्ट्रीयन श्रावण माह में कीर्तन परंपरा शुरू की, जो करीब 100 वर्ष से जारी है।
श्रीराम कानड़कर कहते हैं कि एक वह दौर था जब गोपाल मंदिर में कथा सुनने होलकर राजवंश के सदस्य भी आते थे। मंदिर को फूलों से सजाया जाता था और सभामंडप ही नहीं, बल्कि आसपास का स्थान भी श्रोताओं से भरा रहता था। माइक जैसी कोई सुविधा नहीं होती थी। कथाकार को बुलंद आवाज में कथा सुनानी भी होती थी और कीर्तन भी करना होता था। तबला या पखावज वादक और एक हारमोनियम वादक साथ होता था। राज परिवार के सदस्य सम्मान निधि, वस्त्र-उपवस्त्र आदि हमें देते थे। जब राजाश्रय हटा तो खासगी ट्रस्ट ने सम्मान निधि देने की जिम्मेदारी उठाई। आज की तरह पहले भी जगह-जगह कथा होती थी।
वर्ष भर में इंदौर तो हम केवल दो माह ही रुकते थे, शेष वक्त गांव-शहर में कथा करने में ही बीतता था। कथा में केवल देवी-देवताओं के चरित्र और लीलाओं का ही वर्णन नहीं होता, बल्कि राजा भरत, शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप, रानी लक्ष्मीबाई की कर्तव्यनिष्ठा के बारे में भी बताया जाता है। मीराबाई, जानाबाई, संत तुकाराम, संत ज्ञानेश्वर, गोरखनाथ, गोपीचंद, नानीबाई का मायरा आदि भी इसमें शामिल हैं। इसमें हिंदी, मराठी, गुजराती, मालवी, ब्रज और पंजाबी के शब्दों का भी समावेश है। नारदीय कीर्तन परंपरा में कीर्तनकार को खड़े रहकर ही कथा और कीर्तन सुनाना होता है। वर्तमान में इसके सुनने और सुनाने वाले शहर में कम हो गए हैं।