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आज वंदे मातरम् पर विवाद, तब स्वतंत्रता के दीवाने इसे गाते ही नहीं, पहनते और जीते भी थे

Vande Mataram: इंदौर के इतिहासकार जफर अंसारी के 'जफर अंसारी म्यूजियम ऑफ इंदौर' में सहेजी वस्तुएं बताती हैं कि वंदे मातरम् लोगों के पहनावे और रोजमर्रा ...और पढ़ें

By Digital DeskEdited By: Prashant Pandey
Publish Date: Wed, 19 Aug 2026 09:38:27 AM (IST)Updated Date: Wed, 19 Aug 2026 09:55:30 AM (IST)
आज वंदे मातरम् पर विवाद, तब स्वतंत्रता के दीवाने इसे गाते ही नहीं, पहनते और जीते भी थे
म्यूजियम ऑफ इंदौर में वंदे मातरम् से जुड़ी वस्तुएं सहेजकर रखी गई हैं।

HighLights

  1. आज जहां वंदे मातरम् पर बहस है, वहीं आजादी के दौर में यह सिर्फ गीत नहीं था
  2. इंदौर में सहेजी वस्तुएं बताती हैं कि वंदे मातरम् लोगों के पहनावे और रोजमर्रा में था
  3. धरोहरों को बचाने का मकसद नई पीढ़ी को सेनानियों के त्याग और समर्पण से जोड़ना

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। आज वंदे मातरम् को लेकर देश में बहस-विवाद है, लेकिन स्वतंत्रता आंदोलन के दौर की दुर्लभ धरोहरें बताती हैं कि तब वंदे मातरम् केवल गाया नहीं जाता था, बल्कि उसके प्रतीक लोगों के पहनावे और रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा थे। इंदौर के इतिहासकार जफर अंसारी के 'जफर अंसारी म्यूजियम ऑफ इंदौर' में पिछले अनेक वर्षों से सहेजीं गईं वंदे मातरम् से जुड़ी दर्जनों वस्तुएं इसकी प्रमाण हैं।

संग्रह में वंदे मातरम् अंकित बटन, चांदी के कफलिंग, तांबे से बनी विशेष घड़ी, ध्वज की पुरानी प्रतिकृति, कपड़ा मिलों के थानों पर लगाए जाने वाले स्टीकर और 78 आरपीएम के ग्रामोफोन रिकार्ड शामिल हैं। अंसारी के अनुसार संग्रह में करीब 20 ग्रामोफोन रिकार्ड हैं, जिनमें वंदे मातरम् के बंगाली, हिंदी और मराठी संस्करण हैं।


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घड़ी में गांधी-तिलक, हर घंटे बजती थी घंटी

संग्रह की विशेष वंदे मातरम् घड़ी पर महात्मा गांधी और लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के चित्रों के साथ वंदे मातरम् अंकित है। अंसारी के अनुसार घड़ी में हर घंटे एक बालक बाहर निकलकर घंटी बजाता था। संग्रह में वंदे मातरम् अंकित धातु के बटन भी हैं, जिन्हें अंसारी स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों द्वारा खादी के जैकेट पर लगाए जाने से जोड़ते हैं। बटनों पर तिरंगा और चरखा भी अंकित हैं।

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ध्वज की प्रतिकृति भी सहेजी

अंसारी के पास मैडम भीकाजी कामा के 1907 में विदेश में फहराए गए ध्वज की 1937 में कागज पर प्रकाशित प्रतिकृति भी है। इसके मध्य में हिंदी में वंदे मातरम् अंकित है। संग्रह में गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का मूल हस्ताक्षरयुक्त चित्र और वंदे मातरम् से जुड़े पुराने ग्रामोफोन रिकार्ड भी हैं। ये वस्तुएं बताती हैं कि स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम् गीत से आगे बढ़कर दृश्य प्रतीकों और जनभावना का हिस्सा बन चुका था।

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प्रधानमंत्री भी कर चुके सराहना

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वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर अंसारी ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को वंदे मातरम् अंकित बटनों का एक सेट भेंट किया था। प्रधानमंत्री ने पत्र लिखकर उनके संग्रह की सराहना की। अंसारी का कहना है कि इन धरोहरों को सुरक्षित रखने का उद्देश्य आने वाली पीढ़ियों को स्वतंत्रता सेनानियों के त्याग, बलिदान और देश के प्रति समर्पण से जोड़ना है।

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वंदे मातरम् घड़ी

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आजादी के पहले वंदे मातरम् के प्रचार-प्रसार के लिए जर्मनी में बनवाई गई इस दुर्लभ घड़ी पर गांधी, तिलक, ऋषि-मुनियों, भगवान कृष्ण और मां सरस्वती के चित्र हैं। हर घंटे एक बालक बाहर निकलकर घंटी बजाता था। मूल घड़ी में गांधी के हाथ में धनुष-बाण भी दिखाया गया था, जिसे बाद में हटा दिया गया। ऐसी गिनी-चुनी घड़ियां ही अब बची हैं।

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