
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर : अयोध्यापुरी की चार एकड़ जमीन रहवासियों के हाथ से फिसल गई है। जिला कोर्ट ने जमीन अयोध्यापुरी रहवासी कल्याण संघ और देवी अहिल्या संस्था के जमीन पर दावे को खारिज कर दिया है। '
कोर्ट ने सिंपलेक्स इंवेस्टमेंट एंड मेगा फाइनेंस कंपनी के पक्ष में निर्णय दिया है। जिला कोर्ट ने कंपनी की रजिस्ट्री को वैध करार दिया है। यह कंपनी प्रतीक संघवी, दीपक मद्दा के निदेशन वाली है।
बताया जा रहा है कि 1986 में सीलिंग से मुक्त जमीन 1986 में देवी अहिल्या संस्था ने खरीदी थी। कुल 15.52 एकड़ जमीन में से चार एकड़ जमीन संस्था ने 2007 में सिंपलेक्स कंपनी को बेच दी। कुल सौदा 4 करोड़ में हुआ। कुल 20 चेक दिए लेकिन पूरा भुगतान नहीं हुआ और 1.80 करोड़ के चेक ही भुनाए गए।
2008 में कालोनी का रहवासी संघ बना और चार एकड़ जमीन पर अपने रहवासी सदस्यों का दावा बताया। कंपनी जिला कोर्ट चली गई थी जिस पर अब निर्णय आया है।जमीन की कीमत करीब साढ़े तीन सौ करोड़ बताई जा रही है।
इंदौर के अयोध्यापुरी कॉलोनी की करीब चार एकड़ बेशकीमती जमीन के स्वामित्व को लेकर चल रहे विवाद में जिला कोर्ट ने सिम्पलेक्स इन्वेस्टमेंट एंड मेगा फाइनेंस कंपनी के पक्ष में फैसला सुनाया है।
जिला न्यायाधीश डॉ. शुभ्रा सिंह ने 65 पेज के फैसले में देवी अहिल्या श्रमिक कामगार सहकारी संस्था द्वारा कंपनी के पक्ष में की गई रजिस्ट्री को वैध माना और अयोध्यापुरी रहवासी कल्याण संघ के दावों को खारिज कर दिया। इस जमीन की मौजूदा कीमत करीब 350 करोड़ रुपए बताई जा रही है।
विवादित जमीन को लेकर पूर्व कलेक्टर मनीष सिंह के कार्यकाल में प्रशासन ने कार्रवाई की पहल की थी। सहकारिता विभाग के माध्यम से रजिस्ट्री निरस्त कराने के लिए कोर्ट में आवेदन भी दिया गया था। हालांकि, सुनवाई के दौरान जिला प्रशासन और सहकारिता विभाग की ओर से प्रभावी पक्ष नहीं रखे जाने का मामला सामने आया।
अब फैसले के बाद रहवासी संघ ने हाईकोर्ट में अपील करने की बात कही है। कलेक्टर शिवम वर्मा ने भी कहा है कि आदेश की प्रति मिलने और उसका अध्ययन करने के बाद आगे की कार्रवाई तय की जाएगी।
2007 की रजिस्ट्री को कानूनी रूप से वैध माना : कोर्ट ने 24 फरवरी 2007 को सिम्पलेक्स कंपनी के पक्ष में की गई जमीन की रजिस्ट्री को वैध माना। फैसले के मुताबिक, संस्था की वार्षिक आमसभा में प्रस्ताव पारित करने के बाद जमीन बेचने की प्रक्रिया पूरी की गई थी।
अतिरिक्त जमीन पर सदस्यों के प्लॉट होने के प्रमाण नहीं मिले : रहवासी कल्याण संघ ऐसा ठोस दस्तावेज, लेआउट या नक्शा पेश नहीं कर सका, जिससे साबित हो कि विवादित अतिरिक्त जमीन पर संस्था के किसी सदस्य का व्यक्तिगत भूखंड था। संस्था के पास कुल 6.75 लाख वर्गफीट जमीन थी। सदस्यों को प्लॉट आवंटित करने के बाद बची जमीन कंपनी को बेचे जाने का पक्ष रखा गया।
संस्था और कंपनी के बीच धोखाधड़ी के प्रमाण नहीं मिले : कोर्ट ने संस्था और कंपनी के बीच हुए अनुबंध तथा रजिस्ट्री में धोखाधड़ी के पर्याप्त प्रमाण नहीं पाए। इसी आधार पर जमीन के हस्तांतरण को अवैध ठहराने की मांग स्वीकार नहीं की गई।
प्रशासन और सहकारिता विभाग प्रभावी पक्ष नहीं रख पाए : मामले में जिला प्रशासन और सहकारिता विभाग की ओर से ठोस जवाब प्रस्तुत नहीं किए जाने से विवाद में उनका पक्ष प्रभावी ढंग से सामने नहीं आ सका। इससे कंपनी के पक्ष में आए फैसले के बाद प्रशासन की आगे की रणनीति महत्वपूर्ण हो गई है।
फैसले से असंतुष्ट अयोध्यापुरी रहवासी कल्याण संघ ने इसे हाईकोर्ट में चुनौती देने की बात कही है। संघ के सचिव एमके सिंह का दावा है कि जमीन की पहली रजिस्ट्री संस्था के नाम हुई थी और कंपनी ने गलत तरीके से जमीन हासिल कर दोहरी रजिस्ट्री कराई। उनका कहना है कि विवादित जमीन पर सदस्यों को प्लॉट आवंटित किए जाने हैं।
कलेक्टर शिवम वर्मा ने कहा कि अभी आदेश की प्रति नहीं मिली है। निचली अदालत ने जो फैसला दिया है, उसका अध्ययन किया जाएगा। यदि फैसला प्रशासन के पक्ष में नहीं है, तो ऊपरी अदालत में अपील करने के विकल्प पर विचार किया जाएगा।
जिला कोर्ट के निर्णय से फिलहाल सिम्पलेक्स कंपनी के पक्ष में जमीन के स्वामित्व को लेकर कानूनी स्थिति मजबूत हुई है। हालांकि, रहवासी संघ की प्रस्तावित अपील और प्रशासन के अगले कदम से यह विवाद आगे भी जारी रह सकता है। अब हाई कोर्ट में चुनौती दिए जाने पर मामले के महत्वपूर्ण कानूनी पहलुओं की दोबारा समीक्षा हो सकती है।