
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। घर, स्कूल और दफ्तरों में आरओ (रिवर्स ऑस्मोसिस) फिल्टर को सुरक्षित पेयजल की गारंटी माना जाता है, लेकिन यहां के प्रतिष्ठित शिशुकुंज स्कूल में आरओ के पानी में ई. कोलाई और कोलीफॉर्म बैक्टीरिया मिलने की घटना ने इस धारणा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जब पेयजल आरओ से गुजर चुका था, तो उसमें बैक्टीरिया आए कहां से?
इसका जवाब हाल ही में आईआईटी मद्रास और उसके सहयोगी संस्थानों के अध्ययन में मिलता है। चेन्नई के 216 घरों से लिए गए 262 पोस्ट-आरओ पानी के नमूनों की जांच में 31 प्रतिशत नमूनों में ई. कोलाई पाया गया। शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि कई मामलों में समस्या आरओ मशीन नहीं, बल्कि पोस्ट-ट्रीटमेंट कंटैमिनेशन यानी पानी के आरओ से गुजरने के बाद उसके भंडारण, रखरखाव और उपयोग के दौरान दोबारा दूषित होने की होती है।
आरओ तकनीक पानी में घुले हुए लवण (टीडीएस), भारी धातुओं और अधिकांश सूक्ष्मजीवों को हटाने में सक्षम होती है, लेकिन सुरक्षित पानी केवल मशीन पर निर्भर नहीं करता। यदि यूवी यूनिट खराब हो, फिल्टर समय पर न बदले जाएं, स्टोरेज टैंक की सफाई न हो या पाइपलाइन दूषित हो जाए, तो शुद्ध किया गया पानी दोबारा संक्रमित हो सकता है।
मिथक: आरओ लगा है, इसलिए पानी पूरी तरह सुरक्षित है।
सच्चाई: मशीन के बाद पानी का भंडारण, टैंक, पाइपलाइन और रखरखाव भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
मिथक: टीडीएस कम है, इसलिए पानी सुरक्षित है।
सच्चाई: टीडीएस केवल घुले ठोस पदार्थों की मात्रा बताता है, बैक्टीरिया या वायरस की मौजूदगी नहीं।
मिथक: फिल्टर बदल दिया, अब कोई चिंता नहीं।
सच्चाई: यूवी यूनिट, स्टोरेज टैंक, पाइपलाइन और नलों की नियमित सफाई व जांच भी जरूरी है।
मिथक: आरओ मशीन लग गई तो पानी की जांच की जरूरत नहीं।
सच्चाई: स्कूल, हॉस्टल, अस्पताल और बड़े संस्थानों में समय-समय पर माइक्रोबायोलॉजिकल जांच कराना आवश्यक है।
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