
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर : कथित रूप से फर्जी कोर्ट आदेश, अवार्ड और डिक्री तैयार कर संपत्तियों पर कब्जा करने के गंभीर मामले में कोर्ट की नाराजगी के बाद जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित की गई है। न्यायमूर्ति संदीप एन भट्ट की कोर्ट में सुनवाई के दौरान शासन ने इसकी जानकारी दी। कहा कि टीम शिकायतों और विभिन्न न्यायालयों के आदेशों की प्रमाणित प्रतियां जुटाकर जांच कर रही है। इस पर कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मामले की जांच और कार्रवाई की निगरानी हाई कोर्ट स्वयं करेगा।
मामला न्यू पलासिया क्षेत्र की संपत्ति से जुड़ा है। याचिकाकर्ता जहांगीर डी. मेहता और अशोक जैन का आरोप है कि द रियल नायक साख सहकारी संस्था से जुड़े लोगों ने फर्जी न्यायिक आदेशों और कूटरचित दस्तावेजों के आधार पर संपत्ति हड़पने की कोशिश की। इन आदेशों के आधार पर विभिन्न अदालतों में निष्पादन की कार्यवाही भी शुरू कराई गई।
कुछ मामलों में अदालतों ने आदेशों को वास्तविक मानकर लागू करने योग्य माना। इस मामले में दक्षिण तुकोगंज थाने में 1 मई 2018 को एफआईआर दर्ज हुई थी, लेकिन आठ साल बाद भी चार्जशीट प्रस्तुत नहीं की गई। कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान संस्था अध्यक्ष दीपक पंवार उपस्थित हुए और हस्तक्षेप आवेदन के माध्यम से अपना पक्ष रखने की इच्छा जताई।
अशोक जैन ने 3/3 न्यू पलासिया की संपत्ति 10 सितंबर 2015 को रजिस्ट्री के माध्यम से खरीदी थी। अभियोजन के अनुसार, संपत्ति पहले एराक्सा दोसा भाई की थी। उनकी मृत्यु के बाद पुत्रों केरसी और होमी तथा पुत्रियों जेरू और नर्गिस को संपत्ति मिली। दोनों पुत्र अविवाहित और नि:संतान थे। पुत्री जेरू ने शादी की थी, लेकिन उनके पति की भी मौत हो गई थी। उनकी कोई संतान नहीं थी।
जेरू की मृत्यु के बाद संपत्ति नर्गिस के पक्ष में आई। नर्गिस की मृत्यु के बाद उनके चचेरे भाई जहांगीर डी. मेहता को हाई कोर्ट ने संपत्ति का प्रशासन पत्र जारी किया था। इसके बाद अशोक जैन ने उनसे संपत्ति खरीदी। आरोप यह है कि संस्था अध्यक्ष दीपक पंवार और अन्य लोगों ने मूल स्वामियों की मृत्यु का लाभ उठाकर मध्यस्थम परिषद के नाम से ऋण वसूली का अवॉर्ड तैयार किया और उसमें न्यायालय शब्द जोडकऱ उसे अदालत के आदेश जैसा स्वरूप दिया। इसे जिला न्यायालय में निष्पादन के लिए पेश किया गया।
आरोप यह भी है कि 12 जून 2012 को 24 करोड़ रुपये के अन्य व्यक्तियों के ऋण का जमानतदार बताते हुए कूटरचित दस्तावेज तैयार किए गए और संपत्ति को ऋण की प्रतिभूति बताया गया। वहीं 10 दिसंबर 2010 को 27 करोड़ रुपए का एक अन्य कथित फर्जी अवार्ड तैयार किया गया। इसमें वर्ष 2004 में संस्था द्वारा नर्गिस को चार करोड़ रुपए ऋण देने और जेरू को उसकी जमानतदार बताया गया था। अभियोजन के अनुसार, इस ऋण के समर्थन में कोई ऋण अनुबंध, गारंटी अनुबंध या ऋण वितरण पत्र प्रस्तुत नहीं किया गया था। मामले में अगली सुनवाई 30 नवंबर को होगी।