भागीरथपुरा त्रासदी एक चेतावनी, भारत में दूषित पानी बना रहा है लाइलाज 'सुपरबग्स', क्या बेअसर हो रही हैं 'एंटीबायोटिक' दवाएं?
Public Health Crisis: हाल ही में इंदौर के भागीरथपुरा में हुई घटना, जहां सीवेज का पानी पीने की पाइपलाइन में मिलने से कई मौतें हुईं, ने एक गहरे और अदृश् ...और पढ़ें
Publish Date: Fri, 16 Jan 2026 09:16:43 PM (IST)Updated Date: Fri, 16 Jan 2026 09:16:43 PM (IST)
भारत में दूषित पानी बना रहा है लाइलाज 'सुपरबग्स'। (Image Source: AI-Generated)HighLights
- भारत के जल स्रोतों में पनप रहे हैं 'सुपरबग्स'
- क्या दवाओं का असर खत्म होने की कगार पर
- प्रदूषित नदियां-सीवेज बन रहे बैक्टीरिया का घर
नईदुनिया प्रतिनिधि। हाल ही में इंदौर के भागीरथपुरा में हुई घटना, जहां सीवेज का पानी पीने की पाइपलाइन में मिलने से कई मौतें हुईं, ने एक गहरे और अदृश्य खतरे—'एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस' या 'सुपरबग्स' की ओर इशारा किया है। चिकित्सा जगत में एंटीबायोटिक्स को 'चमत्कारी दवा' माना जाता रहा है, जिसने पिछली शताब्दी में लाखों लोगों की जान बचाई। लेकिन आज वही दवाएं बेअसर साबित हो रही हैं।
क्या है एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस और सुपरबग्स?
एंटीबायोटिक वे दवाएं हैं जो बैक्टीरिया को मारकर संक्रमण ठीक करती हैं। 'एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस' तब होता है जब बैक्टीरिया इन दवाओं के खिलाफ जीवित रहने के लिए खुद को ढाल लेते हैं। कुछ बैक्टीरिया कई दवाओं के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं, जिन्हें 'सुपरबग्स' कहा जाता है। 'एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस' (AMR) एक व्यापक शब्द है जिसमें वायरस, कवक और परजीवी भी शामिल हैं।
प्रदूषण बना रहा है बैक्टीरिया को 'शक्तिशाली'
भारत में प्रदूषित पानी एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस का सबसे बड़ा वाहक है। नदियों और झीलों में छोड़े जाने वाले अनुपचारित सीवेज और औद्योगिक कचरे में एंटीबायोटिक यौगिक होते हैं। इन प्रदूषित जल स्रोतों में रहने वाले बैक्टीरिया दवाओं के संपर्क में आकर निम्नलिखित तरीके से खुद को बचाना सीख जाते हैं:
- दवाओं को नष्ट करने वाले एंजाइम बनाना।
- दवाओं को अपनी कोशिकाओं में प्रवेश करने से रोकना।
- अपनी आंतरिक संरचना को बदलना ताकि दवाएं काम न करें।
भारत के लिए खतरे की घंटी: डरावने आंकड़े
- WHO GLASS 2025 रिपोर्ट: एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी बैक्टीरिया दुनिया भर में 12.7 लाख मौतों के लिए सीधे जिम्मेदार हैं।
- द लैंसेट की रिपोर्ट: भारत में 83% मरीज 'सुपरबग्स' के वाहक हैं।
- भारत में हर तीन में से एक संक्रमण (जैसे E. coli और S. aureus) अब सामान्य एंटीबायोटिक्स से ठीक नहीं हो रहा है।
- देश के 80% नदी क्षेत्र एंटीबायोटिक प्रदूषण के कारण 'उच्च जोखिम' श्रेणी में हैं, जिससे 31.5 करोड़ लोगों के स्वास्थ्य को खतरा है।
संक्रमण का फैलाव: खेत से थाली तक
यह केवल पानी तक सीमित नहीं है। प्रदूषित जल का उपयोग खेतों में सिंचाई के लिए किया जाता है, जिससे बैक्टीरिया फसलों और खाद्य पदार्थों तक पहुँच जाते हैं। इसके अलावा, पशुपालन और मत्स्य पालन में विकास को बढ़ावा देने के लिए एंटीबायोटिक्स का अत्यधिक उपयोग किया जाता है। भारत से निर्यात की गई सब्जियों और दूध के नमूनों में भी प्रतिरोधी बैक्टीरिया पाए गए हैं।
सरकार के प्रयास और चुनौतियां
भारत ने इस खतरे से निपटने के लिए कई कदम उठाए हैं:
- स्वच्छ भारत अभियान और नमामि गंगे: सीवेज और कचरा प्रबंधन के माध्यम से प्रदूषण कम करना।
- NAP-AMR (नेशनल एक्शन प्लान): एंटीबायोटिक के उपयोग को नियंत्रित करना।
- शेड्यूल H और H1 नीति: बिना डॉक्टर की पर्ची के एंटीबायोटिक की बिक्री पर रोक लगाना।
- नफीथ्रोमाइसिन: भारत ने तीन दशकों के शोध के बाद मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट पैथोजन से लड़ने के लिए नई स्वदेशी एंटीबायोटिक विकसित की है।
हालांकि, सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (STP) की कमी और नियमों का सख्ती से पालन न होना अभी भी बड़ी चुनौतियां हैं।
आप खुद को कैसे बचा सकते हैं?
- खुद से दवा न लें: बिना डॉक्टर की सलाह के एंटीबायोटिक न खरीदें।
- पूरा कोर्स करें: दवा बीच में न छोड़ें, भले ही आप ठीक महसूस करें।
- स्वच्छता: नियमित हाथ धोएं और भोजन को अच्छी तरह पकाकर खाएं।
- टीकाकरण: बीमारियों से बचने के लिए समय पर टीके लगवाएं।
- पानी उबालें: दूषित जल की आशंका होने पर पानी को हमेशा उबालकर पिएं।
इंदौर की भागीरथपुरा जैसी घटनाएं केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं हैं, बल्कि यह हमारे भविष्य के स्वास्थ्य के लिए एक चेतावनी हैं। यदि हमने पानी के जहर और दवाओं के दुरुपयोग को नहीं रोका, तो भविष्य में एक मामूली संक्रमण भी लाइलाज और जानलेवा हो सकता है।
सोर्स: India Water Portal