
नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर : हाई कोर्ट के आदेश के तीन वर्ष बाद भी हुकमचंद मिल के 400 से ज्यादा मजदूरों के स्वजन परिसमापक कार्यालय के चक्कर लगाकर परेशान हैं। इन लोगों को अब तक मुआवजा राशि ही नहीं मिली।
ये वो लोग हैं जिनके परिवार का कोई सदस्य कभी मिल में मजदूरी करता था और मिल बंद रहने के दौरान उस सदस्य की मृत्यु हो गई है। तकनीकी रूप से इन्हें थर्ड पार्टी कहा जाता है। हाई कोर्ट के आदेश के बाद इनके मुआवजा क्लेम तो निर्धारित हो गए, लेकिन भुगतान नहीं हुआ।
12 दिसंबर 1991 को हुकमचंद मिल बंद होने के बाद से मिल के 5895 मजदूर और उनके स्वजन अपने हक के लिए भटक रहे थे। 6 अगस्त 2007 को हाई कोर्ट ने मिल के मजदूरों के पक्ष में 228 करोड़ 79 लाख 79 हजार 208 रुपये का मुआवजा तय किया था।
यह भुगतान मिल की जमीन बेचकर दिया जाना था लेकिन मिल की जमीन बिक ही नहीं सकी। बाद में निगम और मप्र गृह निर्माण मंडल ने मिल की जमीन पर संयुक्त रूप से आवासीय और व्यवसायिक प्रोजेक्ट लाने की योजना बनाई। 25 दिसंबर 2023 को हाउसिंग बोर्ड ने मजदूरों के भुगतान के लिए राशि बैंक खाते में जमा करा दी। इसके बाद मजदूरों को मुआवजा भुगतान की प्रक्रिया शुरू हो गई।
हुकमचंद मिल मजदूर, कर्मचारी, अधिकारी संघ के नरेंद्र श्रीवंश ने बताया कि कोर्ट के आदेश के बाद अब तक लगभग 5100 मजदूरों को मुआवजा मिल चुका है। 418 परिवार ऐसे हैं जिनमें क्लेम की राशि का निर्धारण तो हो चुका है। सूची परिसमापक को सौंपी भी जा चुकी है, बावजूद इसके भुगतान नहीं हो रहा। ये परिवार परिसमापक कार्यालय के चक्कर लगाकर परेशान हैं, लेकिन कोई जवाब नहीं मिल रहा। ऐसी स्थिति में आशंका है कि इस साल भी इन परिवारों की दीपावली बगैर मुआवजा ही बीतेगी।
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