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मां बगलामुखी मंदिर की बेशकीमती जमीन सरकार को मिली वापस, वर्षों से चला आ रहा विवाद हुआ समाप्त

MP News: हाई कोर्ट ने आगर मालवा जिले के नलखेड़ा स्थित प्रसिद्ध मूर्ति श्रीराम मंदिर (मां बगलामुखी मंदिर परिसर) की बहुमूल्य जमीन पर सरकार का अधिकार एक ...और पढ़ें

By Kuldeep BhawsarEdited By: Dheeraj Belwal
Publish Date: Fri, 28 Nov 2025 10:24:13 PM (IST)Updated Date: Fri, 28 Nov 2025 10:24:13 PM (IST)
मां बगलामुखी मंदिर की बेशकीमती जमीन सरकार को मिली वापस, वर्षों से चला आ रहा विवाद हुआ समाप्त
वर्षों से चला आ रहा विवाद हुआ समाप्त।

HighLights

  1. बहुमूल्य जमीन पर सरकार का अधिकार एक बार फिर स्थापित कर दिया
  2. मामले को लेकर सरकार के खिलाफ 2007 से चल रही अपील निरस्त की
  3. हाई कोर्ट ने फर्जी डिक्री को अवैधानिक बताते हुए कहा भूमि मंदिर की है

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। हाई कोर्ट ने आगर मालवा जिले के नलखेड़ा स्थित प्रसिद्ध मूर्ति श्रीराम मंदिर (मां बगलामुखी मंदिर परिसर) की बहुमूल्य जमीन पर सरकार का अधिकार एक बार फिर स्थापित कर दिया है। कोर्ट ने इस मामले को लेकर सरकार के खिलाफ वर्ष 2007 से चल रही अपील निरस्त कर दी। मंदिर परिसर स्थित जमीन का विवाद दो दशकों से अधिक समय से लंबित था।

वर्ष 1997 में कुछ लोगों ने महत्वपूर्ण तथ्यों को छुपाकर और फर्जी आधार पर इस जमीन के संबंध में एक डिक्री प्राप्त कर ली थी। इस डिक्री पर सवाल उठे और जिला न्यायालय में वाद प्रस्तुत हुआ। जिसके बाद आगर अपर जिला न्यायाधीश ने 14 मार्च 2007 को विस्तृत साक्ष्यों के आधार पर उक्त डिक्री को अवैध व शून्य घोषित कर दिया था। जिला न्यायालय के इस फैसले के खिलाफ प्रथम अपील दायर हुई जिसे कोर्ट ने शुक्रवार को निरस्त कर दिया।


डिक्री धोखे से और दस्तावेजों को छुपाकर प्राप्त की गई थी

कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि वर्ष 1997 में प्राप्त डिक्री धोखे से और दस्तावेजों को छुपाकर प्राप्त की गई थी। यह विधिक रूप से टिकाऊ नहीं है। कोर्ट ने यह भी माना कि मंदिर को उस वाद में पक्षकार तक नहीं बनाया गया था, जबकि विवाद स्वयं मंदिर की संपत्ति से संबंधित था। कोर्ट ने यह भी देखा कि प्रस्तुत वसीयतनामा संदेहास्पद था और मूल राजस्व अभिलेख मंदिर/मठ की पारंपरिक गुरू-चेले प्रणाली की पुष्टि करते थे।

अपील निरस्त करने से मंदिर की भूमि सुरक्षित हुई

मामले में शासन की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता आनंद सोनी ने अंतिम बहस की। उन्होंने कोर्ट के समक्ष राजस्व अभिलेख, ओकाफ समिति के मूल रिकार्ड, मंदिर की ऐतिहासिक संरचना, पूर्व के न्यायालयीन निर्णय तथा फर्जी दस्तावेज़ों के पूरे क्रम को स्पष्टता से रखा। अदालत ने माना कि धोखाधड़ी के माध्यम से उक्त भूमि पर गलत तरीके से दावा स्थापित करने की कोशिश की गई थी। हाई कोर्ट द्वारा सरकार के पक्ष में अपील निरस्त करने से मंदिर की भूमि सुरक्षित हो गई है।

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गौरतलब है कि उक्त वादित भूमि राजस्व अभिलेखों के अनुसार ऐतिहासिक रूप से मंदिर/धर्मशाला की रही है। उक्त संपत्ति विधिवत मूर्ति श्रीराम मंदिर व्यवस्थापक कलेक्टर के नाम दर्ज है। न्यायालय ने कहा कि किसी भी कपटपूर्ण दावे अथवा दस्तावेज़ से मंदिर की संपत्ति पर अधिकार स्थापित नहीं किया जा सकता है।