अंग्रेजों से आज तक : नई नहीं है देवी-देवताओं को गार्ड ऑफ ऑनर देने की परंपरा, 187 साल पहले ब्रिटिश संसद में हुई थी बहस
देवास के प्रसिद्ध मां चामुंडा मंदिर में पहली बार माता को गार्ड ऑफ ऑनर देने का निर्णय लिया गया है। देवी को सैन्य सम्मान देने का यह फैसला आज की व्यवस्था...और पढ़ें
Publish Date: Tue, 29 Sep 2026 06:08:36 PM (IST)Updated Date: Tue, 29 Sep 2026 06:08:36 PM (IST)
भगवान महाकाल को भी दिया जाता है गार्ड ऑफ ऑनर। (एआई इमेज)HighLights
- प्रश्न यही था कि सलामी राजा को दी जा रही है या साथ चल रहे देवी- देवता को
- देवास के प्रसिद्ध मां चामुंडा मंदिर में पहली बार माता को गार्ड ऑफ ऑनर देने का निर्णय लिया गया है
- देवी को सैन्य सम्मान देने का यह फैसला आज की व्यवस्था का हिस्सा है
अरविंद दुबे, नईदुनिया, इंदौर : देवास के प्रसिद्ध मां चामुंडा मंदिर में पहली बार माता को गार्ड ऑफ ऑनर देने का निर्णय लिया गया है। देवी को सैन्य सम्मान देने का यह फैसला आज की व्यवस्था का हिस्सा है, लेकिन इसका ऐतिहासिक संदर्भ करीब 187 वर्ष से भी पुराना है।
13 अगस्त 1839 को ब्रिटिश संसद के उच्च सदन में भारत के धार्मिक जुलूसों में सैनिकों की मौजूदगी और देवता की प्रतिमा को दी जाने वाली सलामी पर बाकायदा बहस हुई थी। प्रश्न यह था कि सैनिकों का सम्मान वास्तव में किसके लिए है- राजा के लिए या उसके साथ जुलूस में चल रहे देवी- देवता की मूर्ति के लिए?
यह विवरण ब्रिटिश संसद की आधिकारिक कार्यवाही के अभिलेख ‘हैंसर्ड’ में दर्ज है। उस दिन ‘भारत में मूर्तिपूजा’ विषय पर बहस हुई थी। अभिलेख से पता चलता है कि भारतीय धार्मिक जुलूसों में सरकारी सैनिकों की भूमिका और देवता की मूर्ति को दी जाने वाली सलामी ब्रिटिश शासन के लिए भी विवाद का विषय बन चुकी थी।
संसद में किसने क्या कहा था?
- लंदन के बिशप : भारतीय धार्मिक जुलूसों में सरकारी सैनिकों की भागीदारी पर आपत्ति जताई। उनका कहना था कि राजा के सम्मान में गार्ड ऑफ ऑनर भेजने पर आपत्ति नहीं है, लेकिन यदि राजा के साथ देवता की मूर्ति भी जुलूस में हो और सैनिक उसे सलामी दें तो स्थानीय लोग इसे देवता को दिया गया सम्मान मानते हैं।
प्रधानमंत्री विस्काउंट मेलबर्न : सैनिकों को धार्मिक समारोहों का हिस्सा नहीं बनना चाहिए। हालांकि राजाओं के साथ दिए जाने वाले सैन्य सम्मान को जारी रखने की बात कही। उनका तर्क था कि यह सम्मान राजा के लिए है, धार्मिक आयोजन के लिए नहीं।
ड्यूक आफ वेलिंगटन : भारत में अपने अनुभव का हवाला देते हुए कहा कि सरकार की नीति स्थानीय धार्मिक रीति-रिवाजों में हस्तक्षेप से बचने की रही है। उन्होंने धार्मिक मामलों में अत्यधिक हस्तक्षेप से सावधानी बरतने की बात कही। परंपरा आज भी जारी
1839 की इस बहस से पता चलता है कि भारतीय धार्मिक जुलूसों में देवता को सैनिक सलामी देने की प्रथा उस समय तक बड़ा मुद्दा बन गई थी। ब्रिटिश सरकार सरकारी सैनिकों को धार्मिक समारोहों से दूर रखने और सैन्य सम्मान को राजाओं के सम्मान तक सीमित रखने की नीति पर विचार कर रही थी। इसके बावजूद देवताओं को राजकीय या सैन्य सम्मान देने की परंपरा अलग-अलग देवस्थलों में अलग रूपों में बनी रही, जो आज भी जारी है।
देवता को गार्ड ऑफ ऑनर क्यों?
- कुछ प्रमुख देवस्थलों में देवता को केवल आराध्य नहीं, बल्कि राजा या राज्य के अधिपति के रूप में मानने की परंपरा रही है। इसी भाव से देवता की सवारी में राजकीय प्रतीकों और सैन्य सम्मान की परंपराएं जुड़ीं।
- ओरछा में रामराजा को राज्य का राजा माना जाता है, जबकि उज्जैन में भगवान महाकाल को राजाधिराज के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है।
- इन दोनों स्थानों पर देवता की सवारी और राजकीय सम्मान की परंपरा आज भी धार्मिक आस्था और शासन की ऐतिहासिक अवधारणा के मेल को दिखाती है।
अनूठी परंपराएं
- सिद्धि विनायक, मेहसाणा : गणेशोत्सव के पहले दिन पुलिस की ओर से गणपति को गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता है। यह परंपरा गायकवाड़ शासनकाल से जुड़ी और करीब 150 वर्ष पुरानी बताई जाती है।
- कालभैरव, उज्जैन : डोल ग्यारस की सवारी में पुलिस का गार्ड ऑफ ऑनर मिलता है। खास बात यह है कि सवारी भैरवगढ़ केंद्रीय जेल पहुंचती है और जेल के मुख्य द्वार पर भी बाबा को गार्ड ऑफ ऑनर दिया जाता है।
ब्रिटिश शासनकाल में गार्ड ऑफ ऑनर की शुरुआत हुई थी
ब्रिटिश शासनकाल में गार्ड ऑफ ऑनर की शुरुआत हुई थी। रियासतों को उनके आकार के अनुसार सम्मान दिया जाता था। यही व्यवस्था आगे धार्मिक जुलूसों और मंदिरों तक पहुंची। सरकारी ताजियों को 21 तोपों की सलामी दिए जाने के उदाहरण भी मिलते हैं। इस तरह राजकीय सम्मान की यह व्यवस्था धीरे-धीरे धार्मिक परंपराओं का हिस्सा बन गई। - जफर अंसारी, इतिहासकार, इंदौर