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इंदौर के वे क्षेत्र... जहां आज भी ताजा हैं स्वतंत्रता आंदोलन की यादें

1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम से लेकर महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोजन तक और उसके बाद भी हर संग्राम और आंदोलन में इंदौर के क्रांतिकारियों ने बढ़-च...और पढ़ें

By bharat mandhanyaEdited By: Ramnath Mutkule
Publish Date: Sat, 15 Aug 2026 07:58:58 AM (IST)Updated Date: Sat, 15 Aug 2026 08:13:55 AM (IST)
इंदौर के वे क्षेत्र... जहां आज भी ताजा हैं स्वतंत्रता आंदोलन की यादें
रेसीडेंसी कोठी पर किया गया था हमला। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. स्वतंत्रता के आंदोलन में देश के हर क्षेत्र के साथ इंदौर ने भी कदम से कदम मिलाते हुए अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी
  2. इंदौर में आज भी कई स्थान हैं, जो स्वतंत्रता आंदोलन और क्रांतिकारियों के बलिदान की याद दिलाते हैं
  3. 1 जुलाई 1857 को रेसीडेंसी कोठी पर तोपों से गोले छोड़े गए, इसके बाद कार्यवाहक एजीजी ड्यूरेंड को वहां से भागना पड़ा

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर : भारत ने करीब एक सदी के संघर्ष के बाद स्वतंत्रात प्राप्त की। इस एक सदी में हमारे क्रांतिकारियों ने कई यातनाएं झेली, जेल गए और दमन सहा, लेकिन स्वतंत्रता की भावना कभी कम न हुई। स्वतंत्रता के इस आंदोलन में देश के हर क्षेत्र के साथ इंदौर ने भी कदम से कदम मिलाते हुए अंग्रेजी हुकूमत को चुनौती दी।

1857 के पहले स्वतंत्रता संग्राम से लेकर महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोजन तक और उसके बाद भी हर संग्राम और आंदोलन में इंदौर के क्रांतिकारियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। इंदौर में आज भी कई स्थान हैं, जो स्वतंत्रता आंदोलन और क्रांतिकारियों के बलिदान की याद दिलाते हैं।


रेसीडेंसी में गूंजा तोप का पहला गोला

1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का असर इंदौर में भी देखने को मिला। इतिहासकार गणेश मतकर के संग्रह से सुनील मतकर ने बताया कि एक जुलाई 1857 को रेसीडेंसी कोठी पर तोपों से गोले छोड़े गए। इसके बाद रेसीडेंसी के कार्यवाहक एजीजी ड्यूरेंड हो वहां से भागना पड़ा।

कोठी पर दिल्ली का बादशाही हरा परचम लहरया गया। इस क्रांति का संचालन होल्कर सेना के अधिकारी सआदत खां, बंसगोपाल, नवाज वारिस मोहम्मद, मौलवी अब्दुल समद, अरादूसिंह और भागीरथ सिलावट कर रहे थे। महू छावनी में भी इसी दिन सेना ने विद्रोह कर दिया। महू की सेना भी इंदौर आ गई और स्वतंत्रता सेनानियों में शामिल हो गई। चार दिन तक इंदौर रेसीडेंसी पर सेना नायकों का कब्जा रहा। इस लड़ाई में फतेह मंसूर तोप से पहला गोला दागा गया। यह तोप आज भी केंद्रीय संग्रहालय में संरक्षित है।

एमवाय अस्पताल के पास दी गई बख्तावर सिंह को फांसी

इंदौर में कई क्षेत्र बलिदानियों की गाथ सुनाते नजर आते हैं। इनमें से एक है एमवाय अस्पताल के पास स्थित नीम का पेड़। इस पेड़ पर ही 1857 की क्रांति के नायक अमझरा के राणा बख्तावर सिंह को फांसी दी गई थी। राणा बख्तावर सिंह ने अंग्रेजों की छावनी भोपावर पर हमला कर दिया था। उन्होंने भोपावर, सरदारपुर छावनी, नीमच छावनी और मनावर तक अंग्रेजों का सफाया किया कर दिया था, लेकिन उन्हें समझौता करने के बहाने गिरफ्तार कर दिया गया और इंदौर लाया। मुकदमे में अपराधी पाए जाने पर राणा बख्तावरसिंह को फांसी की सजा सुनाई गई। 10 फरवरी 1857 को एमवाय रोड़ स्थित डाक्टरों के क्वाटर्स के सामने एक नीम के पेड़ पर फांसी दी गई। जनता में भय पैदा करने को दो दिन उनके शव को नहीं उतारा गया। इससे पूर्व उनके साथियों को भी इसी पेड़ पर फांसी पर चढ़ाया गया था।

सराफा बना रणनीति का केंद्र

साल 1900 के बाद स्वतंत्रता का आंदोलन और जोर पकड़ता जा रहा था। अलग-अलग क्षेत्रों में अंग्रेजों के विरूद्ध रणनीतियां बनने लगी थी। इसमें से एक क्षेत्र सराफा का चुना गया। अखिल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम सेनानी उत्तराधिकारी संगठन के प्रदेश अध्यक्ष मदन परमालिया के अनुसार, उन दिनों सराफा में क्रांतिकारियों की बैठकें हुआ करती थी।

क्षेत्र में आने वाले अन्य क्रांतिकारियों को क्रांतिकारियों की पहले से ही मौजूदगी की जानकारी देने के लिए सिंदूर लगे डंडे का उपयोग किया जाता था। सराफा चौराहे पर एक टंकी को काटकर उसमें बालू रेल भरी गई थी, जिस पर सिंदूर से रंगकर एक डंडा गाड़ दिया गया। यह डंडा इस बात का संकेत था कि यह क्रांतिकारियों का क्षेत्र है और यहां पहले से क्रांतिकारी मौजूद हैं।

खातीपुरा में हो रही थी लड़ाई

जहां सराफा बाजार में क्रांतिकारी बैठकें करते तो वहीं जेल रोड स्थित खातीपुरा में अंग्रेजों से सीधी लड़ाई लड़ी जाती थी।बकौल मदन परमालिया खातीपुरा क्षेत्र दो हिस्सों में बंटा था, जहां एक ओर ब्रिटिश हुकूूमत थी तो वहीं दूसरी ओर होल्कर स्टेट का शासन था। खास बात यह थी कि दोनों की ओर से सैनिक एक-दूसरे की सीमा पार नहीं करते थे, क्रांतिकारी ये बात खूब जानते थे, जिसका फायदा उन्होने जमकर उठाया। क्रांतिकारी अंग्रेजों के क्षेत्र में जाते, वहां गदर मचाते और वापस होलकर स्टेट में लौट आते, ब्रिटिश सैनिकों की मजबूरी थी कि वे होलकर स्टेट में नहीं आ पाते थे।

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