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भीषण गर्मी का असर: इंदौर में गिद्धों की संख्या में भारी गिरावट, महू और रालामंडल में एक भी गिद्ध नहीं आया नजर

भीषण गर्मी और जंगल में पानी की कम उपलब्धता के वजह से गिद्धों का पलायन हुआ है। यहां तक कि जंगलों में मवेशियों के शव भी कम फेंके जाने लगे हैं।

By Kapil NileyEdited By: Ramnath Mutkule
Publish Date: Sun, 24 May 2026 11:32:36 AM (IST)Updated Date: Sun, 24 May 2026 11:42:54 AM (IST)
भीषण गर्मी का असर: इंदौर में गिद्धों की संख्या में भारी गिरावट,  महू और रालामंडल में एक भी गिद्ध नहीं आया नजर
इंदौर के जंगल में गिद्ध। (फाइल फोटो)

HighLights

  1. ग्रीष्मकालीन गिद्ध गणना के दूसरे दिन 62 मिले गिद्ध
  2. जंगल में पानी की कम उपलब्धता के वजह से गिद्धों का पलायन हुआ है
  3. गिद्धों के लिहाज से वातावरण अनुकूल नहीं माना जा रहा है

नईदुनिया प्रतिनिधि, इंदौर। प्रदेशभर के जंगल में ग्रीष्मकालीन गिद्ध गणना चल रही है। इसके अंतर्गत दूसरे दिन शनिवार को इंदौर वनमंडल में गिद्धों की गिनती की गई। जहां इंदौर-चोरल, मानपुर को छोड़कर महू और रालामंडल में एक भी गिद्ध नहीं नजर आया है।

भीषण गर्मी और जंगल में पानी की कम उपलब्धता के वजह से गिद्धों का पलायन हुआ है। यहां तक कि जंगलों में मवेशियों के शव भी कम फेंके जाने लगे हैं। अधिकारियों के मुताबिक घने जंगल का दायरा कम हो रहा है। इसके चलते गिद्धों के लिहाज से वातावरण अनुकूल नहीं माना जा रहा है।


गिद्धों की गिनती के लिए इंदौर वनमंडल की चारों रेंज में 33 स्थानों को चिह्नित किया गया है। तीन दिनों तक चलने वाली ग्रीष्मकालीन गणना के दूसरे दिन इंदौर में 12 और चोरल में 46 गिद्ध देखे गए हैं। रालामंडल अभयारण्य और महू के वनक्षेत्रों में सुबह दो घंटे तक सर्चिंग की गई, लेकिन वहां एक भी गिद्ध मंडराते नहीं दिखा।

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पांच-छह साल पहले इंदौर रेंज के देवगुराड़िया क्षेत्र में सबसे ज्यादा गिद्ध देखे जाते थे, क्योंकि वहां ट्रेंचिंग ग्राउंड में कचरा पड़ा रहता था। साथ ही मृत मेवशियों को भी फेंका जाता था। मगर कुछ वर्षों में स्थिति में काफी बदलाव देखा गया है। इस वजह से शनिवार को भी सिर्फ एक गिद्ध नजर आया है।

पूर्व वन अधिकारी पीसी दुबे के मुताबिक पहले पशु चिकित्सक बीमार मवेशियों को ‘डाइक्लोफेनाक’ नाम की दर्द निवारक दवा देते थे। इन पशुओं के शवों को खाने से गिद्धों पर दवा का दुष्प्रभाव होता था और उनकी किडनी फेल हो जाती थी। इसके अलावा भोजन की कमी और लगातार शारीरिक तनाव ने उनकी प्रजनन क्षमता भी कम कर दी है। शहरीकरण और विकास परियोजना का असर भी पर्यावरण पर पड़ा है। गिद्धों के घोसले बनाने और रहने के लिए ऊंची चट्टानें और पेड़ कम हो गए हैं। सड़क और रेलवे परियोजनाओं के चलते तेजी से जंगल साफ हो रहे हैं।

डीएफओ लाल सुधाकर सिंह का कहना है कि शीतकालीन की तुलना में अभी गिद्धों की संख्या कम है। इसके पीछे दो से तीन वजह सामने आई हैं। इसमें जंगलों में जलस्रोत भी सूखने लगे हैं। वे उन स्थानों के लिए पलायन कर चुके हैं। जहां पर्याप्त मात्रा में पानी मौजूद है। मवेशियों के शव भी खुले में नहीं फेंके जाते हैं। दूसरा वजह भीषण गर्मी को माना जा सकता है।

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